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मैं कॉमरेड क्यों नहीं बन सका

कॉमरेड होना इतना आसान नहीं है। हर रोज सत्ता-व्यवस्था से लड़ना-भिड़ना पड़ता है। विरोधियों के तंज सहने पड़ते हैं। विचार और वैचारिकता के नाले में निरंतर डूबना-उतरना पड़ता है। धर्म-भक्ति का तीव्र विरोध करना पड़ता है। अमेरिका को गलियाना पड़ता है। वाम पंथ को जीवन में अच्छे से उतारना पड़ता है। नक्सलवाद का समर्थन करना पड़ता है। हर वक्त ऐंठा-ऐंठा सा, खफा-खफा सा रहना पड़ता है। तब कहीं जाकर कॉमरेड बनने का दम-खम शरीर में प्रवेश करता है। 

एकाध दफा मैंने भी जिगर को मजबूत कर कोशिश की थी कॉमरेड बनने की, लेकिन बन न सका। उनकी तगड़ी शर्तों पर खरा उतर न पाया। उनकी वैचारिक ऊर्जा को आत्मसात न कर सका। अत: बीच में ही त्याग दिया अपने कॉमरेड बनने का सपना। मेरे एक करीबी मित्र कॉमरेड हैं। रात-दिन कॉमरेडगिरी में ही उलझे रहते हैं। विकट वैचारिक गुस्सैल हैं। उनका अकड़ू हाव-भाव देख कोई भी समझ जाता है कि बंदा कुछ कॉमरेड टाइप है। कॉमरेडों की सबसे बड़ी खूबसूरती उनका हर वक्त ‘असहमत’ रहना है। मानो असहमति की घुट्टी उन्हें बचपन में ही पिला दी जाती है। पता नहीं, घर में अपनी बीवी-बच्चों के साथ कैसे सहमति बनाते होंगे? कॉमरेड को सहमत कर लेना या उससे सहमत हो जाना सबसे कठिन काम है, और, सातवां अजूबा भी। कॉमरेड अपने जीवन और आचरण में कितनी बार क्रांति कर लेते हैं, अक्सर उन्हें खुद भी पता नहीं रहता होगा। मुझे तो कभी-कभी लगता है कि वे खाना भी बिना क्रांति बोले गले से नीचे न उतारते होंगे। 

कॉमरेड हंसते कम हैं। बोलते भी कम। दुनियादारी की चिंताओं से जब मुक्ति पाएंगे, हंसेंगे-बोलेंगे तो तब न। बेचारे दिन के जागने से लेकर रात को सोने तक गरीब, दलित, बेरोजगारी, भूख, क्रांति, आजादी, अभिव्यक्ति पर ही चिंतन-मनन करते रहते हैं। इतना आसान न होता यह सब। इसीलिए तो मैंने कॉमरेड बनने का विचार त्यागा। 

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  • Web Title:Nashtar Column in daily Hindustan on 07 september