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भारतीय प्रजातंत्र के गुप्त कलाकार

वह एक कलाकार है। बीच में पहाड़ उठाकर झट से हिन्दुस्तान की आबादी गांव और शहरों में बांट देता है। इसमें विद्वेष की झलक हो, तो हो। उसके गांव वाले गंवई-गंवार हैं और शहरी चुस्त चालाक। यूं उसकी नजर में दो तरह का हिन्दुस्तान है। गांव को सुधार की दरकार है, शहरी उसके लिए योजनाएं बना रहे हैं। कैसे ‘डोल’ देकर उन्हें अपाहिज बनाना है? कैसे देश को भ्रष्टाचार के जाल में बांधना है? दरअसल, देश का काला साहब, ‘अंग्रेजियत’ में गोरों के भी कान काटता है। तभी तो वहां के ‘डोल’ की हूबहू नकल करने में वह विशेषज्ञ है। सरकार ने उसे दोनों हिन्दुस्तानों को एक करने की भूमिका सौंपी है। तभी आजकल वे ग्रामवासियों को अंग्रेजी और काले साहबों को हिंदी सिखाने की योजना बनाने में व्यस्त हैं।

आजादी के बाद भारत में इसी तरह के प्रयोग करने में कई कलाकार जुटे हैं। अपनी तूलिका से ये कुछ भी रचने में समर्थ हैं- पेड़, पहाड़, नदी, पुल, झरने। कभी-कभी तो इन्होंने आदर्श राजनेता भी बनाए हैं। उनकी विशेषता है, देशी परिधान में विदेशी सोच। तभी कलाकार परिवर्तन की क्रांति लाने में कामयाब होगा। इतने वर्षों से उसने यही सफल-असफल प्रयास किया है कि दिखने और कहने में भले रामराज्य हो, पर वास्तव में वह रूस या रोम राज्य हो या फिर वाशिंगटन और न्यूयॉर्क का हो। अब तो हमारे राजनेता भी उसी की पढ़ाई-सिखाई भाषा बोलने लगे हैं। 

यदि यह सच है, तो हम इन कलाकारों से काफी प्रभावित हैं। इन्होंने पूरी पीढ़ी में प्रभावी बदलाव लाया है। यहां तक कि हमारे धोती-कुरता धारी राजनेता विदेशों की ही विकास की भाषा बोलते हैं। यदि कोई कानूनी विवाद फंसे, तो फैसला अंग्रेजी में ही सुनाया जाता है और वह भी सूट-कोट धारियों द्वारा। इसे कलाकारों का योगदान ही कहेंगे कि कोर्ट की सारी व्यवस्था फिलहाल अंग्रेजी में ही है। हमारे एक मित्र कानून विशेषज्ञ हैं, लेकिन कोर्ट में प्रैक्टिस के पहले अंग्रेजी सीख रहे हैं।  

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  • Web Title:Nashtar Column in daily Hindustan on 05 November