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ईवीएम की पीं, एवं और एंवई

ईवीएम के इस्तेमाल को लेकर चिल्लपों शुरू हो गई है। हल्ला-गुल्ला है। विजेताओं के लिए यह सदा आदरणीय रही। पराजितों ने इसे खलनायक माना। कुछेक लिए यह भानुमति का पिटारा है, कुछ इसे कटखने कीड़ों से भरा डिब्बा मानते हैं। मतपेटी के जमाने वाले इसे मशीन होने के बावजूद डिब्बा कहते हैं, जैसे वे रेफ्रिजरेटर को ठंडी अलमारी कहते हैं। हर चुनाव के बाद इसमें से बहस के लिए गरमा-गरम पकौड़ियां तली जाती हैं, जिसे सभी मतानुसार लाल या हरी चटनी के साथ उदरस्थ करते हैं।

मतदान स्थल पर ईवीएम तीन तरफा पर्देदारी के बीच किसी नवेली ब्याहता की तरह रखी होती है। लोग कतारबद्ध होकर आते हैं और उसकी मुंह-दिखाई करके बैलेटवाले पुराने दिनों को याद करते हुए लौट जाते हैं। ऐसे मतदाताओं को देखकर ईवीएम बड़ी जोर से ‘पीं’ करती है। ऐसे लोग भी मतदान के लिए पहुंचते हैं, जिन्हें ईवीएम की मंशा में खोट दिखता है। उन्हें लगता है कि मत को दर्ज करते हुए जो ‘पीं’ ध्वनित होती है, वह दरअसल ‘चीं’ जैसी शातिर हंसी या खिल्ली थी। ईवीएम की इस ‘चीं’ और ‘पीं’ के बीच लोकतंत्र किंकर्तव्यविमूढ़ रह जाता है।

अभक्त टाइप की वैज्ञानिक सोच के अलंबरदार कहने लगे हैं कि इस मशीन से बेहतर कागजी पर्ची वाले दिन थे। ये वही लोग हैं, जिनको आज भी कभी धुंआते चूल्हे पर पकी रोटियां याद आती हैं, तो कभी बिजली से जगमगाते लट्टुओं की जगह कड़वे तेल भरी ढिबरी। अन्य बातों की तरह वे दिन भी याद आते ही होंगे, जब राजनीति के झपटमार दस्ते लोकमत को खींचकर अपने पाले में ले जाते थे। जब वोट वाली पर्चियां देखते-देखते तितली की तरह मतगणना की टेबल से फुर्र हो जाती थीं।

अवांतर मुद्दों की तरह ईवीएम के पक्ष में भक्तों का पूरा टोला जुटा है। अभक्त अपनी ढपली लिए अपना राग अलाप रहे हैं। अधिकांश तो ईवीएम को हिंदी वाला एवं समझते हैं। अब उन्हें पता लगा कि यह एवं, नहीं एंवई है। 

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  • Web Title:Nashtar Column in daily Hindustan on 04 September