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यहां सब कुछ चलता है

कुछ हैं, जो 21वीं सदी के उत्तर-आधुनिक काल में समय के अनुरूप स्वयं को ढालने में असमर्थ हैं। कोई उनसे पूछे कि कौन सा उसूल है, जो ऊपर वाले ने खुद गढ़ा है सिवाय इसके कि आया है सो जाएगा राजा, रंक, फकीर।  इसमें मंत्री, अफसर वगैरह और जोड़ दीजिए, तो बात पूरी हो जाती है। वह सच और ईमानदारी का ढोल पीटते हैं। इससे किसे एतराज होगा? कठिनाई यह है कि वह दूसरों से भी ऐसी ही उम्मीद करते हैं। यह भूलते हुए कि क्या ऊपर वाले ने उन्हें नैतिकता का निरीक्षक नियुक्त किया है? वह इस कारण यदि दूसरों को हेय समझकर खुद को श्रेष्ठ मानते हैं, तो मानते रहें। दूसरों से अपनी तुलना को तो बख्शें। उन्हें इसका क्या अधिकार है?

प्रश्न कुछ के लिए वाणी की स्वतंत्रता का ही नहीं, विश्व-बंधुत्व का भी है। संचार-साधनों की सुगमता और उपलब्धता ने अब संसार के मुल्कों को माला के मनकों सा एक में पिरो दिया है। ऐसी स्थिति में यदि कोई बुद्धि के अजीर्ण से पीड़ित देश की कमजोरियों को विदेश में उजागर करता है, तो इसमें कौन सा अपराध है? वह यही तो कह रहा है कि हर चमकती चीज सोना नहीं है, उसका पॉलिश लगा पीतल होना भी संभव है। इसके लिए उसकी आलोचना क्या हद दर्जे की नाइंसाफी नहीं है? वह स्वयं मानता है कि देश के लिए देखे सपनों को वह जनता तक पहुंचाने में असफल रहा है। सत्ता न पाने की पीड़ा उसने जी ही नहीं, भोगी भी है। 

किस कानून की किताब में लिखा है कि कोई निजी खामियों की चर्चा देश के बाहर नहीं करेगा? वह क्या देश से ऐसा एकाकार है कि दोष वह अपने गिनाता है, तो लोग उन्हें खामखां मुल्क से जोड़ लेते हैं? उसका निजी ज्ञान है कि रक्षा सौदे भ्रष्टाचार का पर्याय हैं। उसके लिए इसी आधार पर फ्रांस से लड़ाकू जहाजों की खरीद संदेह के घेरे में है। इसमें कौन सा अन्याय है? हम तो उसे स्पष्टवादिता का आर्दश उदाहरण मानते हैं। 

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  • Web Title:Nashtar Column in daily Hindustan on 03 September