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काले गगन के तले, दिल्ली में दम है घुटे

दिल्ली की बात ही अलग है। कैंडल लाइट डिनर तो सब लेते हैं लेकिन दिल्लीवासियों के पास कैंडल लंच की भी सुविधा है। सूरज तो जैसे दिल्ली में नजरबंद हो गया है, दर्शन ही नहीं होते। काश मुहावरों की कोई संसद होती, कोई संविधान होता। तो प्रदुषणार्थ संविधान संशोधन कर मुहावरे अपने नए स्वरूप गढ़ रहे होते। प्रदूषित शहर वाले तेरा मुंह काला। काले हैं तो क्या हुआ, प्रदूषित शहर वाले हैं। दिल का तो साफ है, लेकिन फेफड़ों का काला है। 

दिलों का प्यार पलने के लिए दिल्ली की धरती पर कभी तालकटोरा स्टेडियम, तो कभी लोधी गार्डन में भटक रहा है। प्यार ने एफएम पर गाना सुन लिया था- नीले गगन के तले धरती पर प्यार पले।  अब बेचारे को दिल्ली की धरती पर वो जगह नहीं मिल रही है, जहां नीला गगन हो। दिल्ली का यह प्यार अब लगातार कंफ्यूज है कि कहीं उसने गलत तो नहीं सुन लिया और असली गाना ये हो कि काले गगन के तले, दिल्ली में दम है घुटे।
पहले कहते थे दिल्ली की फास्ट लाइफ है। अब सही मायनों में हो गई। जो लाइफ औसतन 80 से 100 साल में पूरी होती थी, अब 65 से 70 साल में अपना सफर पूरा कर लेती है। हार्ट अटैक जो 60 साल की उम्र के बाद हासिल होता था, आजकल उससे 40 साल में रूबरू हो जाना आम बात हो गई है। प्रदूषण की यही रफ्तार रही, तो लाइफ को शायद अपनी रफ्तार बढ़ाकर ये सफर 50 या उससे भी कम में ही पूरा करना पड़े। पहले दिल्ली वालों को सांस लेने की फुरसत नहीं थी, अब सांस लेने के लिए हवा नहीं है। लेकिन फास्ट लाइफ के चहेतों के पास फिलहाल तो यह समझने का भी टाइम नहीं है।

आगरा, मेरठ, कानपुर हो या हैदराबाद, मुंबई जैसे बड़े शहर, ये नारा लगा सकते हैं- अब दिल्ली दूर नहीं। दिल्ली ने जो सफर 50 सालों में तय किया है, वो ये शहर अगले पांच सालों में तय कर लेंगे। इन शहरों के पास दिल्ली का अनुभव है।  

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  • Web Title:nashar hindustan column on 9th november