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निर्दोष के दोष बहुत हैं

इधर फांसी चर्चा में है। पहले ये शब्द सुनते ही मुझे भगत सिंह याद आ जाते थे। बाद में कुछ दिन कसाब भी आया। अब फांसी का नया कारण आ गया है। बलात्कार। वो भी उम्र को देखकर। गला दबाने को फांसी नहीं कहते वरना मंहगाई को फांसी हो जाती। दम घुटना भी फांसी नहीं कहा जा सकता। पत्नी से प्रताड़ित, बच्चों से उपेक्षित किस पति का अपने घर में दम नहीं घुटता। सरकारी कर्मचारी का तो दफ्तर जाते ही दम घुटने लगता है। इसलिए वो अक्सर अपनी कुर्सी पर नहीं मिलते। सरकार भी जानती है कि फंसाने को फांसी नहीं कहते।
कहते हैं गला लटक जाए तो फांसी पूरी होती है। किसान और लड़कियां इस कैटेगिरी में नहीं आते। मायूसी से गरीब वोटर का गला लटका हो तो वह फांसी नहीं होती। जेल में दी गई फांसी ऑफिसियल होती है, सो शास्त्रीय श्रेणी में आती है। फांसी में चढ़ना सजा भी है और शौर्य भी। अंग्रेज जिसे फांसी दें वो शहीद। फांसी देना हत्या नहीं होती। हत्या करके आप फांसी में चढ़ सकते हैं। जेल में फांसी से पहले गले और रस्सी का नाप लिया जाता है। फांसी के कारणों की जांच सजायाफ्ता नहीं करता। अपराध साबित होने पर कई साल लग जांए तो मुजरिम स्वयं अपनी मौत मर जाता है। कानून है कि मरणोपरान्त फांसी नहीं होती। ये मुर्दे का अपमान है। 
निर्दोष का कुसूर यही होता है कि उसके पास निर्दोष होने के सबूत नहीं होते। मगर उसे मुजरिम साबित करने के सुबूत जुटाए जा सकते हैं। वकालत पर भरोसा रखना पड़ता है। अगर आपके भीतर अपराध बोध नहीं है तो आप बिना हिचक के पाप कर सकते हैं। नाक कटाने के लिए शूर्पणखा बनना जरूरी नहीे है। पाप या दुराचार कानूनी सलाह लेकर करें ताकि केस हो भी तो लम्बा चले। बहरहाल ये कम है कि अब हमारे यहां मासूम सुरक्षित हैं। जब किडनी रिप्लेस हो सकती है तो हृदय परिवर्तन भी हो सकता है।
    

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  • Web Title:Nashar Hindustan column on 5 may