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पिंजड़े में बंद कौन-कौन


 


सुबह खिड़की के बाहर पीपल पर बैठी चिड़ियों का समूह-गान सुनाई देता है। आसमान में चील-कौओं के ड्रोन का पहरा है। अक्सर ख्याल आता है कि आकाश में मुक्त विचरते तोता-मैना पर पालतू पिंजड़ों में क्या बीतती होगी? बिना प्रयास का दाना-पानी, उड़ान की आजादी गंवाकर, क्या उन्हें स्वीकार है? ऐसा होता, तो पिंजड़ा खुला मिलने पर कुछ पलायन का प्रयास क्यों करते? वहीं कुछ सलाखों की सजा से संतुष्ट हैं। पिंजड़ा खुला हो या बंद, वह टस से मस न होकर मालिक का पढ़ाया पाठ दोहराने में व्यस्त हैं।
जो जैसा है, उसे वैसे ही भाते हैं। आदमी बोलने में समर्थ है, उसे बोलने वाले पंछी ही प्रिय हैं। इसीलिए पिंजड़े के दंड का प्रारब्ध तोता-मैना तक सीमित है। बहेलियों के आकलन में कौआ हो या कोयल, उसका मूल्य न के बराबर है। बाजार मांग से संचालित है। कोई सिरफिरा भी उनकी बोली नहीं लगाता। तोता-मैना इंसान की बोली सीखने की क्षमता से अभिशप्त हैं। कोई उन्हें चाहे राम-राम सिखाए या ‘काम हराम है।’ ऐसी अभिव्यक्ति अंतर के भावों का संप्रेषण भले न हो, मगर चौंकाने में समर्थ है। प्रशंसा से फूले न समाना आदमी का स्वभाव है। कोई घर  आए, तो पिंजड़े के पंछी को उसी गर्व, गौरव और लगन से प्रदर्शित किया जाता है, जैसे बचपन में घर के चिराग की अंग्रेजी कविता को। सामने तारीफ करने वाले व्यक्ति पीठ पीछे कोसते हैं- ‘कैसा क्रूर व्यक्ति है? असहाय पंछियों तक को नहीं बख्शता।’
पंछियों को जबरन किया जाता है, पर आदमी पार्टी के पिंजड़े में क्यों स्वेच्छा से कैद होता है? क्या सिद्धांत अथवा कार्यक्रम के आकर्षण से? अपने ऐसे आम आदमी केवल इतना जानते हैं कि वर्तमान राजनीति उसूल-शून्य है। सियासत की प्रतियोगी दौड़ सिर्फ कुरसी, पैसे व पावर तक सीमित है। नेता का सिद्धांत से उतना ही वास्ता है, जितना शेर का शाकाहार से। कहीं ऐसा तो नहीं है कि पिंजरे में टिके रहने के पीछे पद या सत्ता का प्रलोभन है?

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  • Web Title:Nashar Hindustan column on 30 july