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कैद में है बुलबुल, सैयाद मुस्कराए

यह तो जगजाहिर है कि जब बुलबुल कैद में हो, तो कौन सैयाद है, जो मुस्कराता नहीं? जेल में बंद कैदी को देखकर कौन थानेदार ठहाके नहीं मारता? जेल में रहना अैर जेल में जन्म लेना दो अलग बातें हैं। वैसे, जेल और पुलिस वालों का चोली-दामन का साथ हमेशा से रहा है। आजन्म कारावास वाले कैदियों का तो जेल से ऐसा अपनापा हो जाता है, जैसे हम लोगों का अपने गांव-देहात से होता है। मैंने तो ऐसे आत्मीय कैदी देखे हैं, जो बरी होते समय कहते हैं- कैद मांगी थी रिहाई तो नहीं मांगी थी। 

पुलिस विभाग को भगवान कृष्ण इसलिए ज्यादा प्रिय हैं, क्योंकि वही उनकी दुखती रग छेड़ते हैं। पूरे विभाग को याद रहता है कि जन्माष्टमी के दिन उनके पुरखे घोड़े बेचकर सो रहे थे। इसीलिए कृष्णजी जन्म लेते ही छू मंतर हो गए। यूं तो विभाग अब भी सोया रहता है और कोई भी नटवरलाल तिहाड़ तोड़कर फरार हो जाता है, लेकिन दोनों नटवरलालों में फर्क है। यूं तो जेल से नेताओं का रिश्ता बना रहता है। कुछ दबंग नेता ऐसे भी होते हैं, जो अपराधी होते हुए भी जेल नहीं जाते। वे अपनी कोठी के गेट पर जेल का साइनबोर्ड लटका देते हैं। खुदा भी खुश, शैतान भी खुश। जेलों और पुलिस लाइनों में जन्माष्टमी के दिन श्रीकृष्ण की लीलाओं के कार्यक्रम होते हैं। इनकी झांकियों में जेल के पहरेदारों को सोता हुआ नहीं दिखाया जा सकता। उधर बैंक के चौकीदार कभी सोते ही नहीं। डकैती फिर भी हो जाती है।

इसी दिन टोकरी में लेटे शिशु कृष्ण के पांव पखारने के लिए जमुना नदी उछाल मारने लगती है। अधर्मी लोग इसे बाढ़ का प्रकोप कहते हैं। इस पर्व पर तो हर भक्त का मन मथुरा और तन वृंदावन हो जाता है। इसी दिन मामा लोग खुंदक में रहते हैं। जिन बच्चों को मामा सुलभ नहीं होते, वे पुलिस वालों को ही मामा बना लेते हैं। थानेदार बुरा भी  नहीं मानते। यह सोचकर कि आखिर कौन इन बच्चों की मां की रक्षा करेगा?

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  • Web Title:nashar hindustan column on 1st of september