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ऐसे ही होते हैं विकास के बच्चे 

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने हमारी सेहत पर गहरा वार किया है। उसकी रिपोर्ट बताती है कि देश के 42 करोड़ लोग आलसी हैं। समझ में नहीं आता कि इतने लोग आलसी हैं, तो देश आगे कैसे जा रहा है? वे लोग कह रहे हैं, देश का आर्थिक स्वास्थ्य दमक रहा है, ये लोग कह रहे हैैं कि रुपया रसातल में चला गया है और पेट्रोल आसमान में जल रहा है। आठ साल के बच्चे को स्कूटी सिखा दी गई है। जिस घर में जितने बंदे, उतने टू व्हीलर और कारें अलग से। जीडीपी की इज्जत का सवाल है। 

ऑनलाइन बाजार की कृपा से यहां हर सामान आपके घर पर हाजिर। बंदा हिले नहीं, बस रिमोट को पकड़े रहे। सब कुछ पकाने की मशीनें किचन में घुस गई हैं। हर सब्जी का मसाला पहले से तैयार और तरीका यू-ट्यूब पर है। न मां से पूछना, न पड़ोसन से। अब तो पकाने की भी जरूरत नहीं, हुक्म कीजिए और खाना सीधे मुंह में हाजिर। अपने फेवरेट कार्यक्रम के दौरान नींद आई, तो सोफे को बेड बनाकर वहीं लेट जाओ। 

सुना है, पिछले 16 साल में सेहत के गिरने में शानदार क्रांति आई है। महिलाएं दोगुनी आलसी मानी गई हैं। पहले बड़ी परेशानी होती थी, प्लस साइज के कपडे़ सिलवाने पड़ते थे, अब ब्रांडेड उपलब्ध हैं। जंक फूड ने प्लास्टिक की तरह जिंदगी पर कब्जा कर लिया,तो समझाया जा रहा है कि जंक फूड ने जंग लगा दिया। विकास के बच्चे ऐसे ही होते हैं। सुविधाएं दुविधाएं पैदा करती हैं। हाथ-पांव हिलाने की जरूरत ही नहीं रही। डॉक्टर हिंदी मंथ में भी अंग्रेजी बोलता है, फिर रोगी कहता है कि हिंदी में बताओ। डॉक्टर ओहो कहकर समझाता है कि आलस्य इंसान के शरीर में रहने वाला उसका सबसे बड़ा दुश्मन है, पैदल चला करो। ठीक कहा, अब तो पैदल वही चल सकता है, जिसे डॉक्टर कहे। पैदल चलने की जगह कहां है? स्वास्थ्य मंत्रालय को पैदल चलने का कानून बना देना चाहिए। क्या राष्ट्रीय आलस, कानून को लागू करने देगा।

 

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  • Web Title:nashar hindustan column on 11 september