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इस सूरत को किसकी नजर लग गई

मेरा मानना है कि आदमी का भाग्य उसके चेहरे पर लिखा होता है। इस मायने में मेरे चेहरे में खोट है। मुझे देखकर ही लोगों को लगता है कि मैं पढ़ा-लिखा और शरीफ आदमी हूं। बचपन से ही आंखों पर मोटा चश्मा और लग गया, जिससे लोगों की यह धारणा और मजबूत होती चली गई। समस्या यह है कि पढे़-लिखे होने और शरीफ होने की धारणा से यह स्वाभाविक निष्कर्ष निकलता है कि मैं किसी काम का आदमी नहीं हूं। मैंने चिल्ला-चिल्लाकर यह सबको बताने की कोशिश की कि मैं पढ़ा-लिखा नहीं हूं और उतना शरीफ भी नहीं हंू, जितना आप समझते हैं, लेकिन लोग नहीं माने।समाज में शराफत और ज्ञान के बारे में यह धारणा पहले से ही थी, और वह ज्यादा मजबूत हो रही है। मेरे एक मित्र के विद्वान और सज्जन पिता एक बार चुनाव लड़ गए। वह जीत गए और मंत्री भी बन गए। लेकिन फिर कभी चुनाव नहीं जीत पाए। उनके चुनाव क्षेत्र के लोग कहते कि चौधरी साहब भले आदमी हैं, पर काम के नहीं हैं। दरअसल, वे कहना चाहते थे कि चौधरी साहब भले आदमी हैं, इसलिए काम के नहीं हैं। इसी धारणा की वजह से दबंग, बाहुबली या अज्ञानी लोग नेता बनने के काबिल मान लिए जाते हैं।

नेता अपने अज्ञान और दबंगई का गर्व के साथ प्रदर्शन किए जाते हैं और लोग लहालोट हुए जाते हैं। कभी-कभी शक भी होता है कि शायद वह इतना अज्ञानी और असभ्य है नहीं, जितना सफल होने के लिए इसका नाटक कर रहा है। कई सफल नेता हैं, जो निजी बातचीत में काफी सभ्य और समझदार मालूम देते हैं, लेकिन मंच पर असभ्यता और मूर्खता का मुखौटा लगा लेते हैं। मेरी समस्या यह है कि मैं इतना अच्छा अभिनेता भी नहीं हूं और न उतना पढ़ा-लिखा और शरीफ हूं कि उससे ही संतुष्ट हो सकूं। अगर इसका उल्टा होता, यानी मैं चेहरे से शरीफ न लगता और जितना पढ़ा-लिखा हूं, बस उतना ही दिखाई देता, तो मैं भी सफल और लोकप्रिय हो सकता था। चेहरे ने मेरी नोटबंदी कर दी, वरना हम भी आदमी थे काम के।
    

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  • Web Title:hindustan nashter column on 12 September