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पीड़ा परक पड़ोस के परिणाम

जीवन भर किराए के घरों में बिताकर जब अपना दड़बा खरीदा, तो पूरा परिवार प्रसन्न था। लग रहा था कि अभी तक सिर पर साया किराए का था, अब अपने हिस्से का है। यह खुली जगह तो फ्री का बोनस है। फ्लैट के साथ मुफ्त लॉन। यूं पीढ़ियों से हमारे अवचेतन में फ्री का ऐसा आकर्षण है कि उसका कभी सोचो भी, तो मन गदगद हो उठता है। फ्लैट में बसने के पहले हमने आसपास और अपनी बिल्डिंग के फ्लैटवासियों के दर्शन किए, तो सब हमें सामान्य लगे। आजकल सभ्यता का ऐसा बाहरी आवरण है कि हत्यारा भी शरीफ ही लगे। कलई तो तब खुली, जब हम वहां शिफ्ट कर गए।

हमने बमुश्किल मौसमी फूल और खुले स्थान में घास लगवाई थी। आंखें खुलीं, तो दूसरे दिन हमें वहां कचरे का ऐसा ढेर नजर आया, जैसे वह स्थान इमारत का सामूहिक कूड़ेदान हो। हम हतप्रभ थे कि क्या करें कि बाहर शोर सुनाई पड़ा। निकले, तो पाया कि बच्चों की टोली वहां क्रिकेट खेल रही है। उन्हें हल्ला न मचाने की हिदायत दे हम अंदर आए ही थे कि एक पत्थर ने अनधिकृत प्रवेश करके खिड़की के कांच को शहीद कर दिया। हम चक्कर में पड़ गए कि क्या हम किसी आतंकिस्तान में भटक गए हैं। हमारा शहर तो किसी सीमा-क्षेत्र के पास भी नहीं है कि अकारण ही गोलीबारी हो जाए या पत्थर-गुम्मे चलने लगें। 

काफी चिंतन के बाद हमने निष्कर्ष निकाला कि कचरे की वारदात ऊपरी मंजिल के निवासी किसी सभ्य परिचित की हरकत है। क्या इस बहुमंजिली इमारत की रीत है कि नए आने वाले का स्वागत इसी प्रकार कचरा-करतूत से किया जाए? बच्चे भी बड़े-बुजुर्गों का अनुकरण करते हैं। तोड़-फोड़ उनकी स्वाभाविक प्रवृत्ति है। हमारा दूसरा दिन सफाई-मरम्मत और पूछताछ में गुजरा। कथनी में तो सब भले ही लगते हैं, करनी का कौन जानता है। हर तीन-चार दिन बाद कूड़ा-वारदात दोहराती है। अपना निष्कर्ष है कि अच्छा-बुरा पड़ोस नियति पर निर्भर है। क्या पता, दूसरों को तंग करना व्यक्ति या देश, कुछ के अस्तित्व की शर्त हो।
 

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  • Web Title:hindustan nashter column on 09 September