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आत्ममुग्ध नायक ही अब सिरमौर

हमारे यहां किसी कालखंड में पाई जाती रही होंगी आत्ममुग्धा नायिकाएं, हमारा यह दौर आत्ममुग्ध नायकों का है। जिधर भी निहारता हूं, अब यही लोग दिखलाई पड़ते हैं। देश में इनकी जमात भी बेरोजगारों की संख्या के बराबर नहीं, तो आसपास तो हो ही चुकी होगी। जरूरी है कि 2021 की जनगणना में इन आत्ममुग्ध प्राणियों की गिनती के लिए भी प्रावधान किया जाए, जिससे इनके आधिकारिक आंकड़े मिल सकें, क्योंकि आंकड़ों की हमें तुरंत समझ आती है। वैसे सच्चाई यह है कि हम इतने अज्ञानी हैं कि हमें यह भी पता नहीं होता है कि ट्रिलियन डॉलर में कितने शून्य लगते हैं?

हम ट्विटर या फेसबुक पर अपने या पराए विचार अंकित कर देते हैं, फिर री-ट्वीट, लाइक, कमेंट गिनते हैं और आत्ममुग्ध होकर अपना इमोजी जैसा चेहरा बनाते हुए नई पोस्ट टांकने में मस्त हो लेते हैं। मेरे एक परिचित ऐसी ही आत्ममुग्धता के शिकार हैं। वैसे उन्हें दूसरों को शिकार बनाने की कला में भी महारत प्राप्त है। उन्हें दो मिनट में किसी को भी पटा लेने की कला आती है। और यही कला उनकी आत्ममुग्धता का मूल है। देश के कई नेता भी राजनीतिक शुचिता को लेकर इतने आत्ममुग्ध देखे जाते हैं कि जैसे ईमानदारी का जन्म उन्हीं की कोख से हुआ है। कुछ दूसरे नेता अपनी भाषण कला को लेकर आत्ममुग्ध रहते हैं। वे मानते हैं कि उन्होंने जिसके पक्ष में प्रचार किया, उसे कोई माई का लाल हरा नहीं सकता है।

आज आत्ममुग्धता का आलम यह है कि जो दो-चार बार टीवी कैमरों में चमक जाता है या जिसकी तस्वीर किसी अखबार के स्थानीय पृष्ठ पर छप जाती है, वह मान लेता है कि उसकी अखिल भारतीय पहचान बन गई। वैसे, ऐसे मामलों में लेखक-कवि सबसे बदनाम कहे जाते हैं। मैं उसी आत्ममुग्ध प्रजाति का कलमकार हूं, इस नाते चलते-चलते अंत में यह लिख देने में मुझे भी कोई संकोच नहीं कि मैं अपने इस लेख पर आज अतिशय आत्ममुग्ध हूं, क्योंकि मैंने आज तक इससे श्रेष्ठ कुछ भी नहीं लिखा है।

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  • Web Title:Hindustan Nashtar Column on 9th July