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एक ही काम के दो स्तर

भारत में दो प्रकार की सेंधमारी प्रचलन में है। एक सामान्य चालू टाइप की सेंधमारी और दूसरी राजनीति की ऊंचे स्तर वाली। दोनों में बड़ा फर्क होता है। सामान्य सेंधमारी में चोर चुपचाप काम करता है। वह चाहता है कि किसी को कानोंकान खबर न हो, इसलिए चोरी-छिपे योजना बनाता है। काम को गुपचुप-गुपचुप अंजाम देता है। वह अपने झोले में लोहे की एक मजबूत कुदाल, जिसमें लकड़ी का हत्था लगा रहता है, लेकर चलता है। उसके दूसरे कंधे पर खाली थैली रहती है। सफलतापूर्वक चोरी करने के बाद भी वह डरा-सहमा सा गली-कूचे, सुनसान वीरान-सी जगह में छिपता फिरता है। उसके सिर पर पकड़े जाने और फिर सजा का खतरा मंडराता रहता है। 

जबकि राजनीति की सेंधमारी का काम डंके की चोट पर किया जाता है। वह अपने एक कंधे पर सोने की नरम सी कई कुदाल, जिसमें मंत्री पद का हत्था लगा रहता है, लेकर चलता है। उसके दूसरे कंधे पर काले कारनामों का कच्चा-चिट्ठा टंगा होता है। सेंधमारी के बाद उसे कोई अपराध बोध नहीं होता। वह सबके सामने, मूछें मरोड़ते हुए, खुलेआम प्रेस कॉन्फ्रेंस में स्वीकार करता है। वह सीना ठोककर बतलाता है कि उसने सामने वाली पार्टी में सेंध मार दी है। इस काम के बाद उसे बड़े तमगे, इनाम मिलना तय होता है। सेंधमारी की सफल वारदात पार्टी के लिए बड़े गर्व का क्षण होती है। इसका जोरदार जश्न मनाया जाता है। देश भर में चर्चा होती है कि फलां पार्टी के स्टार नेता ने विपक्ष के कम स्टार वाले नेता पर ऐसा जादू चलाया कि उसने क्रॉस वोटिंग के लिए फटाफट हामी भर दी। 

सामान्य सेंधमार पेट की खातिर काम करता है। राजनीतिक सेंधमारी करने वाला राजनेता भी पेट की खातिर यह करता है। फर्क बस इतना है कि सामान्य सेंधमार का पेट खाली रहता है, जबकि राजनेता का लबालब होता है। लालची दोनों ही होते हैं, चरित्रहीन भी। यह और बात है कि सामान्य सेंधमार खुद का चरित्र प्रमाण पत्र बनवाने के लिए सेंधमार नेता के पास चक्कर काटता रहता है।

 

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  • Web Title:Hindustan Nashtar Column on 9th August