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एक धारावाहिक भारतीय राजनीति का

मुझे यह शक रहा है कि जो संगठन राम मंदिर बनाने के लिए सालों से उथल-पुथल मचाए हैं, उनकी राम मंदिर बनाने में सचमुच कोई दिलचस्पी नहीं थी। यह इस तरह है कि टीवी पर जो तरह-तरह के सास-बहू सीरियल आते हैं, उन्हें बनाने वालों की इस बात में कोई दिलचस्पी नहीं होती कि नायक-नायिका का मिलन हो जाए, सास और बहू के बीच गलतफहमी दूर हो जाए या नायिका को उसका बेटा मिल जाए और खलनायिका को अपने किए की सजा मिल जाए। अगर ऐसा हो गया, तो सीरियल बंद हो जाएगा। इसलिए ऐन वक्त पर कोई पेच निकल आता है और सुखांत टल जाता है। सीरियल का अंत तभी होता है, जब दर्शक उसे देखना बंद कर देते हैं और तब जल्दबाजी में सीरियल निर्माता सब भले लोगों के साथ भला और बुरे लोगों का बुरा दिखाकर सीरियल बंद कर देते हैं।

राम मंदिर का मामला भी ऐसा ही रहा है। अगर वह बन जाता, तो राम मंदिर आंदोलन बंद हो जाता। विश्व हिंदू परिषद का हर चुनाव के पहले साधु-संतों को बुलाकर राम मंदिर बनाने का प्रस्ताव पास करती है या ऐसा ही कुछ करती है। अगर मंदिर बन जाए, तो उन्हें नया मुद्दा ढूंढ़ना पड़ेगा। बाकी पार्टियों को भी अपने चुनाव घोषणापत्र में बदलाव करना पड़ेगा। राम मंदिर आजमाया हुआ, जाना-पहचाना मुद्दा है, सब उसे जानते हैं। दोनों ओर के वकीलों को सब कुछ जबानी याद हो गया होगा, उन्हें भी अदालत में पेश होने की तैयारी नहीं करनी पड़ती। माहौल बनाने का जैसा अभूतपूर्व काम राम मंदिर ने किया, वैसा किसी ने नहीं किया। यह माहौल महत्वपूर्ण है, मंदिर तो निमित्तमात्र है।

राम मंदिर भाजपा के मार्गदर्शक मंडल का सबसे पुराना सदस्य है, जिसे बीच-बीच में बाहर लाकर उसे हाथ जोड़कर, हार गुलदस्ता भेंट करके वापस भेज दिया जाता है, जहां वह आडवाणी और जोशी के साथ बैठकर पुराने दिन याद करता है। डर सिर्फ एक है, सीरियल निर्माताओं को अगर लग गया कि अब उसकी टीआरपी नहीं है और उन्होंने ग्रैंड फिनाले का तय कर लिया तो?

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  • Web Title:Hindustan Nashtar Column on 13th June