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अहा-अहा मौसम है इस्तिफाना

वाह क्या मौसम है। इस्तीफे झमाझम बरस रहे हैं। जो इस्तीफे बरस नहीं रहे, वे मौके की तलाश में तरस रहे हैं। होटलों के कमरों में इस्तीफे गिर रहे हैं। मौसम विशेषज्ञों के अनुसार, अगले दो-चार दिनों में कहीं-कहीं मूसलाधार और कहीं-कहीं रुक-रुककर इस्तीफे बरसेंगे। बिजली की कड़क के साथ इस्तीफों की बौछारें भी पड़ेंगी। जिसे देखो, होटल को कोपभवन बनाकर माननीय इस्तीफा प्रसाद लग रहा है। गजब तो यह है कि इन दिनों जिसे ये सारे इस्तीफे सौंपे जा रहे हैं, वह खुद इस्तीफा दिए जिद पर अड़ा है कि मैं तो पूरा सूरज खाऊंगा।

मुझे जाने क्या सूझी कि लिखने लगा- एक थी कांग्रेस। इसके आगे को कुछ होता, तो सूझता। सामने देखा, तो भीगे अखबार में इस्तीफे चिपके हुए थे। मैंने सोचा, क्या ये इस्तीफे बाद में राजनीतिक संन्यास में बदल जाएंगे, क्योंकि संन्यास के बाद लोग संत होते देखे गए हैं। फिर लगा कि ये इस्तीफे धौंस हैं, धमकी हैं और चेतावनी हैं कि हम तो डूबेंगे सनम, तुमको भी लेकर डूबेंगे। जब किश्ती ऐसे मल्लाहों के सुपुर्द हो, जिन्हें तैरना नहीं आता, तब समंदर की भूख बढ़ जाती है। हर हनुमान सुरसा के मुंह में नहीं अट पाते। क्योंकि इस्तीफा पराया धन नहीं होता। वैसे भी संत चाहे जेल में हों या बेल में, इस संसार को इससे कभी कोई फर्क नहीं पड़ता दिखता। 
एक जमाने में इस्तीफों का नैतिकता से रिश्ता चोली-दामन जैसा था। अब जब दामन ही गायब है, तो नैतिकता की ऐसी कम तैसी। कोई सरकार को गाली दे, तो कौन विपक्षी ताली नहीं बजाता। वैसे भी जिस छलनी में सत्तर छेद हों, उसे बर्तनों की कतार से इस्तीफा देना ही पड़ता है।

घोड़ा वही, जिसकी दुलत्ती में दम हो। वैसे रेस के किस घोड़े को एक न एक दिन तांगे में नहीं जुतना पड़ता। मैं घर लौटा, तो पत्नी की लिखी चिट्ठी दिखाई पड़ी। लिखा था- अपनी हरकतों से बाज न आए, तो हमेशा के लिए मैके चली जाऊंगी। याद रहे, धमकी को इस्तीफे में बदलते देर नहीं लगती समझे।

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  • Web Title:Hindustan Nashtar Column on 13th July