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गाथा क्रांतिकारी अगस्त महीने की

आधा अगस्त बीतने को है। बिना बरसाने वाले बादलों को निहारता यह बिना मात्रा वाला दो शब्दों का चंचल मन सोच रहा है कि जितना धूम-धड़ाका अगस्त में होता रहा है, हो रहा है और होता रहेगा, बाकी किसी महीनों में नहीं। जनवरी में हैप्पी न्यू ईयर के ढोल-नगाड़े जरूर बजते हैं, लेकिन अगस्त हो-हल्ले की बजाय त्योहारों, देशभक्ति के उबाल और खरीदारी पर भरपूर छूट मिलने वाला महीना भी होता है। बचत से लेकर महाबचत की छूट इसके अलावा अक्तूबर में पड़ने वाली दिवाली पर ही सुनाई पड़ती है।

सामान्य रूप से भैया मेरे राखी के बंधन को निभाना  से लेकर हाथी-घोड़ा पालकी जय कन्हैया लाल  की इसी महीने गुंजायमान होते हैं। और इन सब पर भारी पड़ता है अपनी आजादी को हम हरगिज भुला सकते नहीं  का सालाना संकल्प। जो गौरव व महिमा अगस्त को प्राप्त है, वह शेष एकादश को नहीं। कवियों तक ने अगस्त के अभिनंदन में देशभक्ति से भरपूर गीत रचे, वे स्वतंत्रता दिवस पर अवश्य सुनाई देते हैं, चाहे इंसाफ की डगर पर चलने वाला पाठ हो या आंख में भर लो पानी  वाला विनय।

अगस्त बरसात का भी सीजन होता है। सस्ती के समय में बारिश के वक्त जो सड़कें धुल जाती थीं, अब नहर नजर आती हैं। इस महीने एक निरापद सा वाक्य बोलनेका भी रिवाज है- भारत को हमें आगे ले जाना है। प्रधानमंत्री कहें तो ठीक, लेकिन स्कूल के प्रिंसिपल, जो अनुशासन में विफल होते हैं, वे भी झंडा फहराने के बाद यह कहना नहीं भूलते कि भारत को अभी और आगे ले जाना है।

क्रांति का जिम्मा उठाने वाले अंग्रेजी भाषा के ‘ऑगस्ट’ को सार्थक करने वाले मंथ ने संसद के विगत सत्र में क्रांति की पटकथा लिख डाली। धरती से लेकर आसमान तक हर क्षेत्र में देश आगे बढ़ रहा है अब और कितना आगे जाएगा, यह तो ले जाने वाले ही जानते होंगे। लब्बो-लुआब यह है कि स्वतंत्रता को स्थायित्व देने वाले सुझावों की धूल इसी मास अगस्त नाम मासोत्तमे  में ही झोंकी जाती है।

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  • Web Title:Hindustan Nashtar Column on 13th August