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कितना बदल चुका है चांद

चालीसेक दिनों की यात्रा में अपनी मंजिल तक पहुंचने में उसने जल्दबाजी नहीं की। चंद खिलौना लैहों  वाला ‘बाल-हठ’ ऐतिहासिक पल बनने ही वाला था कि मुंह में आते-आते निवाला छिन गया। तथापि प्रयास का संकल्प बरकरार है। पचासेक साल पहले श्रीमंत नील आर्मस्ट्रांग ने जब चंद्रमा की धरती पर अपने पांव रखे, जानकारी मिली कि उसकी सतह पर गड्ढे ही गड्ढे हैं। वह न सिर्फ टेढ़ा है, बल्कि ऊबड़-खाबड़ भी है। तभी चांद का सारा रोमांस ध्वस्त हो चुका था। न वह बचपन में किस्से-कहानियों में सुनी चरखा कातती बुढ़िया, न खरगोश की आति खुद में समेटे चांद। उत्तर-आधुनिक मम्मा बिरादरी अब चंदा को मामा बताने से रही। कोई युवती नहीं चाहती कि उसे चंद्रमुखी कहा जाए।

चांद और चांदनी कवियों के शृंगार का विषय होते थे, पर वैज्ञानिक सच्चाई सतह पर आते ही कवियों ने किनारा कर लिया। लद गए मुख मयंक सम मंजु मनोहर... सरीखी उपमाओं के दिन। उन गीतों का क्या होगा, जिसमें चांद सी महबूबा हो मेरी  की सोच में नायक गोते लगाता था। या फिर प्रेयसी के सौंदर्य की चर्चा में चांद आहें भरेगा  की ईष्र्या का लोकार्पण।

चांद की हाले सूरत जो विज्ञान ने बयां की है, उसमें मृगलोचिनी से आगे बढ़ने पर कुटाई की नौबत आ सकती है। न हवा, न गर्द, न कूड़ा, न कोई हरकत। जहां गुरुत्वाकर्षण (ग्रेविटी) के अभाव में वजन तक का एहसास न हो, ऐसे में बजाय चांद पर निवास करने के, जैसी भी जो भी घुटन है, धरती पर ही रहना बेहतर। ऐसा कहा है, गुलजार साब ने अपनी नज्म में। 

अपोलो ने रौंदा, लूना ने सताया, तथापि चकोर अभी भी विज्ञान की सच्चाइयों से अनभिज्ञ है। इंटरनेट टीवी के युग में लोग क्या खाक चंदा की लोरी सुनेंगे। तमाम रहस्य खुलने बावजूद आज भी सार्थक है उमाकांत मालवीय की पंक्तियां- प्रतिपदा से अमावस्या, अमावस से पूर्णिमा/ नित्य उजली हंसी का संघर्ष है प्रिय चंद्रमा।

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  • Web Title:hindustan nashtar column on 10 september