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सूपड़ा साफ होने के बाद

अब भाई साहब मीरा रूपी जनता ने तो फिर दोहरा दिया कि मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई।  इधर एक आधुनिक लोकगीत उभरा है- ‘मेरे जिज्जा की है सरकार, जिज्जियो पानी भरें’। सूपड़ा साफ होने के बाद खाली सूप को तो कील पर टांगना ही पड़ता है। जो पराजित हैं, आत्मा का मंथन कर रहे हैं। अगर हम वोटिंग मशीन के कारण नहीं हारे, तो पार्टियों की तकदीर के कारण हारे होंगे। इन्हें तो अब हरिनाम और हरिद्वार तक नसीब नहीं।

देखना, अत्यधिक सुख से आप बोर होने लगेंगे, क्योंकि दुख आत्महत्या कर चुका होगा। अब तो लोमड़ियां मीठे अंगूर खा रही हैं। कौओं की बोलती बंद है। सही बात है कि जब एक बड़ी चिड़िया खेत चुग जाती है, तो निठल्ले बिजूकों को पिटना ही पड़ता है। अब तो कुरुक्षेत्र के मैदान में गाली गुफ्तार और अपशब्दों के निर्जीव शब्द पड़े हैं। उन्हें गिद्ध भी नहीं खा रहे। इनमें कुछ बिना लड़े मर गए और कुछ खौफ खाकर। बहुतों को तो नरक में भी एंट्री नहीं मिल रही, क्योंकि जैसे इनके दिन बहुरे, वैसे उनके नहीं बहुरे।

जहां भी देखिए- ‘जियो-जियो रे लला’ का बधावा चल रहा है। ठीक भी है, जब दोबारा भी लड़का पैदा हो, तो नेग चौगुना हो जाता है। तीखी शहनाइयों की गूंज ओजोन की परत छेद रही है। सबके साथ ने विकास के लिए रास्ता छोड़ दिया है। बाकी लगता है कि अच्छे दिन स्टेशन पर खड़े रेलगाड़ी का इंतजार कर रहे हैं। हर प्यासे के घर कुआं खुद चलकर आएगा। सभी पूतनाएं, कैकेयी, मंथराएं, कुब्जा, ताड़का और शूर्पणखा ताजा-ताजा बनवाए गए कोपभवनों में शिफ्ट हो गई हैं।

अत्यधिक गरमी को देखते हुए भी जब-जब दो-चार बूंदे गिरीं, तो लगा पवनसुत हनुमान जी ने क्रोधी सूरज को दोबारा निगल लिया है। लोकतंत्र के इस महाभरोसे को हमारा सलाम, नमस्ते। जीत के लड्डू बहुत बंट रहे हैं, लेकिन जिन्हें अब तक नहीं मिले, वे जरूर मुंह फुलाए मियां मिट्ठू बने घूम रहे हैं। महाआरती के इस कोरस में मेरा भी सुर मिला दें कि- जियो-जियो रे लला।

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  • Web Title:Hindustan Nashtar Column May 25