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यह सूरज उगता कहां से है

यह सवाल ही जलकुकड़ा है। सूरज कहीं से भी उगे, क्या कर लोगे? इसे कहते हैं, चींटे की हाथी से खुन्नस। तेज धूप में फटे हुए दूध को तो बहुमत की सरकार भी नहीं सिल सकती। धूप में जले हुए को तो सपने भी झुलसे हुए आते हैं। सूरज तो एक गरम फ्रिज है। आइसक्रीम को गरम रखने के लिए। वैसे मेरी इस रचना के छपने से पहले अगर बूंदाबांदी हो जाए, तो समझ लेना कि यह मेरा टोटका था। इधर गरमी से थर्मामीटर टूट रहे हैं। पारे की तरह बिखरे विपक्ष को अब कौन समेटे? अगर रिश्तों में गरमी न हो, तो वे झुलसा देने वाले तापमान में भी ठंडे पड़ जाते हैं। अब आप बुआ-भतीजे के ही देख लीजिए।

गरम चाय में बर्फ नहीं डाली जाती। अगर डाल भी दो, तो वह ठंडी बीयर में नहीं बदलती। सूरज की गरमी से ही चांद ठंडा रहता है। गरम दिमाग से दिया गया तलाक भी नाजायज होता है। इन दिनों तो नल के पानी से ही चाय बन जाती है। बस बाद में पत्ती समेत चीनी फांक लो। दीया तले अंधेरा इसीलिए रहता है कि आप चाहे जितना कोस लो, सूरज को लू नहीं लगती। ऐसी कायरता भी दो कौड़ी की होती है, जो पाकिस्तान की विनम्रता लगे।

दुराचार, अत्याचार और अनाचार की खबरें न हों, तो ठंडा अखबार भला कौन पढे़? अगर गरम विज्ञापन न हों, तो उसे खरीदे भी कौन? वैसे भी ठंडा संपादकीय चुटकुला बन जाता है। गरम आगोश तो सभी को अच्छा लगता है, लेकिन ढीले धनुष से बाण नहीं चलाए जा सकते। अजीब बात है, सबको इंद्रधनुष तो पसंद है, लेकिन सूरज के बाण नहीं। यह भी जरूरी नहीं कि बेहद गरम स्वभाव का व्यक्ति बाद में जाकर भूतपूर्व वामपंथी ही साबित हो।

पुरानी फिल्मों में ठंडे पानी में जलता हुआ गोरा बदन दिखाने की परंपरा थी, ताकि पता चले कि छाले सिर्फ पांवों में ही नहीं पड़ते। अब हथपंखे तो रहे नहीं, इसलिए जब बिजली जाती है, तो लोग आधारकार्ड से ही काम चला लेते हैं। ये दिन तो पसीने के पतनाले बहने के दिन हैं। अब हुजूर सूरज कहीं से उगे, उसका क्या कसूर?

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  • Web Title:Hindustan Nashtar Column June 8