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आधुनिक अस्पताल पर एक निबंध

अस्पताल जैसा कि सब नहीं जानते हैं, वह स्थान भी है, जहां फिल्म स्टार, नेता, टीवी पत्रकार अपना धंधा चमकाने जाते हैं। बिहार के एक अस्पताल में एक फिल्म स्टार गए, उनके साथ उनके प्रशंसकों ने सेल्फी ली। एक हारे हुए नेता गए, उनके साथ उनके चमचों ने सेल्फी ली। कुछ टीवी पत्रकार गए, जिनकी वीडियो-सेल्फी कई दिनों तक टीवी चैनलों पर बार-बार चलती रही।

इस तरह से हम कह सकते हैं कि अस्पताल सेल्फी सेंटर भी होते हैं। यूं कुछ मानते हैं कि अस्पताल में जिंदगी दी जाती है। मानने का क्या है, कोई कुछ भी मान ले।  आस्था के मसलों पर किसी का जोर नहीं है। मानने को यह भी माना जाता है कि दिल्ली के ऑटो रिक्शा में जो मीटर फिट होता है, उससे तय किराया ही सवारी से वसूला जाना चाहिए। इन ऑटो में जो मीटरनुमा है, वह दरअसल एक मॉडर्न आर्ट का नमूना है, जिसे सिर्फ देखिए, समझने की कोशिश न कीजिए। समझ के कुछ नहीं होना।

अस्पताल में दहाड़ते टीवी पत्रकार हैं। चीखते छुटभईए नेता हैं। चुप सत्तासीन नेता हैं। फिल्म स्टार हैं। राम गोपाल वर्मा इस पर अपनी फिल्म की घोषणा कर सकते हैं-अस्पताल में मौत। यह हॉरर फिल्म ही हो सकती है।

अस्पताल तीन तरह के होते हैं- एक गरीबों के अस्पताल, दो मंझोली हैसियत के लोगों के अस्पताल, तीन बहुत बड़े लोगों के बहुत बढ़िया किस्म के अस्पताल। गरीबों के सरकारी अस्पताल में मौत सही दवाई या ऑक्सीजन न मिलने की वजह से हो सकती है। मंझोली हैसियत के लोगों के निजी अस्पतालों में मौत अस्पतालों के बिल देखकर भी हो सकती है। ब्लड प्रेशर चेक करने के पांच लाख वसूल करनेवाला निजी अस्पताल एक तरह से मौत का लोकतंत्र स्थापित करता है। गरीब दवा न होने की वजह से मरेगा, मंझोली हैसियत का बंदा दवा वगैरह का बिल देखकर मरेगा। ऐसे मरो या वैसे।
तीसरे टाइप के अस्पताल यानी बहुत ही बड़े लोगों के अस्पताल भारतवर्ष में नहीं, विदेशों में पाए जाते हैं।

 

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  • Web Title:hindustan nashtar column june 26