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नई सरकार और बेगानी शादी का नाच

नई सरकार के आते ही रामखिलावन ने चुप्पी साध ली है। एकदम रहीम बनकर वह दिनन के फेर को साक्षी भाव से निहार रहा है। उसकी जुबानन पर मानो ताला लटक गया है। इससे पहले तो वह बहुत उत्साहित था, हरदम गाता रहता था- दुख भरे दिन बीते रे भइया, अब सुख आयो रे।  वैसे भी, रामखिलावन टाइप के लोग जितनी सरलता से मुग्ध होते हैं, उतनी ही आसानी से उनका मोहभंग भी हो जाता है। लेकिन अब्दुल्ला नई सरकार के आगमन को लेकर मगन है। बेगानी शादी में नाचने का उसका युगों पुराना अभ्यास है। राजनीतिक दलों को अबदुल्लाओं की सदा जरूरत रहती है। वे अपने काम से काम रखते हैं। बड़े-बडे़ ख्वाब नहीं देखते, जिंदगी को उसकी तात्कालिकता में जीते हैं।

अब्दुल्ला का मन कभी नहीं उलझता। उसकी उम्मीदों की पतंग कभी कन्नों से नहीं कटती। वह किसी से कोई आस नहीं रखता। हर स्थिति को खेल भावना से झेलता है। उसकी मन:स्थिति आईपीएल के दर्शक जैसी होती है, जो न किसी खिलाड़ी के आउट होने से विचलित होता है, और न किसी खिलाड़ी के छक्का लगाने पर उन्मादित। उसके लिए हार-जीत से अधिक खेल की निरंतरता मायने रखती है। सच तो यह है कि नई सरकार बनाने वालों के एजेंडे में न रामखिलावन कभी रहा और न ही अब्दुल्ला। फिर भी उसके लिए वे दोनों इसलिए महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि उनके बिना राजनीति की झीनी चदरिया पर पैबंद नहीं लग पाता। राजनीति में सब कुछ ठीक-ठाक होने से अधिक उसका दुरुस्त दिखना जरूरी होता है। फिलहाल सरकार के लिए यह नई नवेली ब्याहता की तरह उपयुक्त गेटअप और मेकअप का समय है।

रामखिलावन को लगा था कि उसके कष्ट भरे दिन अब फिरने वाले हैं, पर अब वह वीतरागी हो चला है। अब्दुल्ला के पास ऐसा कोई मामला नहीं, इसलिए वह मस्त है। कोई चाहे या न चाहे, अब्दुल्ला की तरह बेगानी शादी में नाचते रहना वस्तुत: आम आदमी का शगल है, मजबूरी भी और कमोबेश नियति भी।

 

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  • Web Title:Hindustan Nashtar Column July 19