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इतना आसान न था विद्वान होना

सोशल मीडिया ने एक क्रांतिकारी काम यह किया है कि सब लोगों को विद्वान बना दिया है। विद्वान भी ऐसे-वैसे नहीं, हर विषय के। एक ही सज्जन सुबह गुड मॉर्निंग के साथ कोई तीन चार लाइन का धार्मिक प्रवचन देते हैं, नाश्ते के बाद बताते हैं कि पेट्रोल डीजल के भाव बढ़ने से आम जनता का कितना फायदा होता है, लंच के पहले वह जापान या चीन के बारे में कोई विद्वतापूर्ण बात बताते हैं। दोपहर की चाय के पहले वह एसिडिटी या कब्ज एक दिन में दूर करने का नायाब नुस्खा लिख मारते हैं। शाम तक अल्पसंख्यक समुदाय और पाकिस्तान के बारे में कुछ ज्ञान होता है। फिर पिछड़े और दलितों के आरक्षण के आर्थिक प्रभाव पर और रात होते-होते एकाध चुटकुला और सोने से पहले फिर धार्मिक और नैतिक ज्ञान।
 

सोशल मीडिया ने हर आदमी को ऐसा ऑलराउंडर बना दिया है, जो एक गेंद आउट स्विंगर डालता है, दूसरी ऑफ स्पिन, तीसरी गुगली, चौथी चाइनामैन, पांचवीं तेज यॉर्कर और छठी टॉप स्पिन। उसके साथ दाहिने और बाएं हाथ से बल्लेबाजी भी करता है, विकेट कीपिंग भी कर लेता है और यह सब बिना मैदान में गए ही संपन्न हो जाता है। सोशल मीडिया वाले कूडे़ का अगर भौतिक अस्तित्व होता, तो उसका ढेर अपने सौरमंडल को लांघकर अपनी आकाशगंगा के कुछ तारों को तोड़ता हुए दूसरी आकाशगंगा तक पहुंच चुका होता।
 

अर्थशास्त्र की एक विद्वान प्रोफेसर ने कहीं गंभीर लेख बजट पर लिखा। एक पत्रकार ने वह लेख ट्विटर पर साझा कर लिया। उसके बाद तो उस लेख, लेखिका और पत्रकार पर टिप्पणियों की बौछारें होने लगीं। ज्यादातर ऐसे थे, जिन्हें अर्थशास्त्र लिखने को कहा जाए, तो पशोपेश में पड़ जाएंगे कि रेफ अ पर लगे या थ पर। पर सबने प्रोफेसर की पूरी पढ़ाई-लिखाई और अनुभव को एक मिनट में ढेर कर दिया। यदि आपके पास कामचलाऊ  साक्षरता, स्मार्टफोन, डॉटा कनेक्शन और मूर्खताजन्य आत्मविश्वास है, तो आप विद्वान हैं। सोचिए, विद्वान होना इतना आसान कब था?

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  • Web Title:hindustan nashtar column July 11