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एक बार फिर से याहू...याहू

एक बार फिर सिद्ध हो गया कि जो समस्या की जड़ में मट्ठा न डाले, उसे चाणक्य नहीं कहते। भारत का मस्तक एक बार फिर स्वच्छ हुआ, तो यह स्वच्छता अभियान के अंतर्गत ही हुआ है। दिल्ली जब किसी की किल्ली उखाड़ लेती है, तो वह मामला अंतरराष्ट्रीय खिल्ली में बदल जाता है। यह भी सही है कि बिगड़ैल भैंसे की नाक में नकेल डाल दो, तो वह माल ढोने लगता है। रस्सी जल गई, पर उसकी ऐंठन टूटने में थोड़ा समय तो लगेगा ही। अब तो हर तरफ बस नया सीन है और नई सीनरी है। हर गली, हर सड़क आजकल निशातबाग हो गई है।

अखंड भारत की इस आरती में मैं रीतिकालीन कवि होना चाहता था, मगर मामूली चंद बरदाई बनकर रह गया हूं। जो कभी खंड काव्य था, अब महाकाव्य है। बारूदी चट्टानों को फोड़कर फिर हरी दूब निकल आई है। लेकिन करें क्या, सांपों को लोटने के लिए तो पाकिस्तानी छाती ही चाहिए। केंचुआ भी सांप बनने की इच्छा से अपना बदन मरोड़ता है और जगह-जगह टूट जाता है। यूं भी बेगानी शादी में अपना माथा कूटते अब्दुल्ले कराची में ही मिलते हैं। वहां के हुक्कामों को काठ की तोपों की सलामी दी जाती है। अब हुजूर अमर अकबर एंथोनी का जो काम ही यही है कि- होनी को अनहोनी कर दे, अनहोनी को होनी। वैसे भी ढाई किलो का हाथ हमारे यहां ही होता है। जो पड़ जाए, तो आदमी उठता नहीं, उठ जाता है।

हमारे जमाने में एक फिल्म आई थी- कश्मीर की कली।  जबर्दस्त हिट हुई थी। इसमें कश्मीर की बर्फीली ढलानों पर उछलते-कूदते नायक शम्मी कपूर याहू...याहू... करके अपनी खुशी प्रगट करते हैं। आज मेरा मन भी श्रीनगर जाकर यही करे, तो मुझे कौन रोक सकता है। वर्षों पहले जब हमारी शादी हुई थी, तब कश्मीर घूमने की बड़ी इच्छा थी, लेकिन नहीं जा पाए। अब जाएंगे। होटल और शिकारा बुक करा लिए हैं। चश्मे का नंबर भी बदलवा दिया है, वो कहा भी है न कि- गो हाथ में जुंबिश नहीं आंखों में तो दम है...।

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  • Web Title:Hindustan Nashtar Column August 10