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25 नवंबर, 2020|1:22|IST

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सरकारी दावों सा एंटीबॉडी का चरित्र

एक सर्वेक्षण में पता चला है कि दिल्ली में करीब 60 लाख लोगों को कोरोना हुआ, ये अपने आप ठीक भी हो गए, और इन्हें पता भी न चला। परीक्षणों में इन लोगों की बॉडी में वे एंटीबॉडी तत्व मिले, जो कोरोना से लड़ने के बाद बॉडी में पैदा हो जाते हैं। एंटीबॉडी के हाल उन चकाचक सरकारी इंतजामों की तरह लग रहे हैं, जो कोरोना से निपटने के लिए किए गए हैं, पर उनका पता नहीं चल पा रहा। बाद में पता चलता है कि अरे इंतजाम था, हमें पता ही न चला! दिल्ली में 60 लाख लोग कोरोनायुक्त होकर कोरोनामुक्त हो लिए, तो पुणे में करीब 33 लाख लोग कोरोनायुक्त होकर कोरोनामुक्त हो लिए, उनको पता भी न चला।
कोरोना की प्रकृति कुछ टॉप सरकारी इंतजामों सी है, जो हो तो जाते हैं इश्तिहारों में, बस पब्लिक को पता नहीं चलता। कोरोना को दरअसल इश्क की तरह होना चाहिए, सबको पता चल जाए, तो आदमी सावधानी बरत ले। इश्क में डूबे आदमी से सावधानी बरतना आसान होता है कि भाई इश्क में गए हैं, अब कविता और शेर ठेलेंगे। पर कोरोना ने सरकारी होना चुना, कोई कुछ नहीं कर सकता। सरकारी दावों की विकट आफत यह होती है कि उन्हें साबित करना भी मुश्किल होता है और खारिज करना भी।
मुझे आने वाले वक्त के कई राजनीतिक इश्तिहार अभी से दिखाई दे रहे हैं- दिल्ली हृदय सम्राट फलानेजी के कुशल नेतृत्व में फलां वार्ड के 7,779 लोगों ने कोरोना को हरा दिया। जिन्होंने हरा दिया, उन्हें खुद अखबार पढ़कर और सर्वेक्षण देखकर पता चला, पर हृदय सम्राट को पहले ही पता हो जाता है। मेरे क्षेत्र में पोस्टर लगे, जिनमें कुछ छुटभैये नेताओं ने क्षेत्र की जनता की तरफ से बड़भैये नेताओं को कोरोना के खिलाफ कुशल संघर्ष की बधाई दी। क्षेत्र की जनता में मैं भी शामिल हूं, अलबत्ता मुझे पता न चला कि मैंने बधाई दे दी।
होता है जी, होता है। आम आदमी बड़ा भोला होता है, उसे कहां कुछ पता चल पाता है। अगर ज्ञानी होता, तो वह बधाई ले रहा होता न।
 

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  • Web Title:hindustan nashtar column 26 august 2020