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31 अक्तूबर, 2020|7:22|IST

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सांच को आंच आ भी जाए तो क्या

सारा पंगा जांच का है। जांच न हो, तो सब कुछ परदे में; जांच शुरू हो जाए, तो खतरा; और बढ़ जाए, तो फिर परदे में आग लगने लगती है। कैसी दुविधा है, हर व्यक्ति सुविधा चाहता है, लेकिन जांच की आंच नहीं चाहता। सब मानते हैं, जांच ईमानदारी और गहराई से की जाए, तो बड़े से बड़ा पंगा नंगा हो सकता है। 
कहा गया है कि सांच को आंच नहीं, लेकिन जांच के सांचे अब ऐसे हो गए हैं कि काले तीतर से लेकर इंसानी शरीर और लोकतंत्र के विशाल हाथी तक की हत्या करने वालों पर कोई खरोंच नहीं आती। अब का मुहावरा, ‘सही जांच की आंख नहीं’ हो गया है। 
वक्त में अगर जांच की टांग न फंसे, तो माहौल शांत रहता है। जांच न होने से मान लिया कि कुछ पता नहीं चलता, लेकिन यह भी तो अच्छा है न कि कुछ बुरा भी पता नहीं चलता। सामाजिक नायकों की जुबान सुन्न हो जाती है, उनके दिमाग खाली इमारतों में तब्दील हो जाते हैं। संजीदा जांच ईमानदारी और सच की तरह परेशान करती है। वक्त ने तो हमेशा चाहा कि जांच होती रहे, लेकिन यहां जांच करवाने वाले से ज्यादा परेशान जांच करने वाला हो उठता है, क्योंकि उसके द्वारा की जाने वाली जांच को धार्मिक, राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक नजरों से भेदा जा सकता है। उसे कई धारों वाली तलवार पर चलना पड़ता है, सबको जख्मी होने से बचाते हुए अपनी जान की रक्षा भी करनी पड़ती है। 
महंगे झूठ को कौन सा सच हरा सका है? कितनी बार ऐसा होता है कि जांच का तीखा कांच असलियत सबके सामने रख देना चाहता है, लेकिन कई साल पेट भरते रहने के बाद जांच हाथों से फिसल जाने वाला बहुत छोटा अंडा देती है। पानी बहुत इकट्ठा करती है जांच, लेकिन बहुत मेहनत करने के बावजूद उसके हाथ में चुल्लू भर भी नहीं बच पाता। सजाएं दूर खड़ी अच्छे वक्त के सहारे मुस्कराती रहती हैं और सत्य, समंदर किनारे मनपसंद साज बजाता रहता है और किसी को पता भी नहीं चलता।  
 

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  • Web Title:hindustan nashtar column 2 october 2020