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Hindi News ओपिनियन नश्तरनेता और चमचा, दोनों एक ही घाट

नेता और चमचा, दोनों एक ही घाट

हर चुनावी वर्ष में चुनावी-बाबाओं, यानी ज्योतिषियों की बन आती है। भारत एक ऐसा अनूठा देश है, जहां हर दल के अपने ज्योतिषी हैं। कोई आका के गांव का रिश्तेदार है, तो किसी ने पहली बार उसके चुनाव जीतने की...

नेता और चमचा, दोनों एक ही घाट
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गोपाल चतुर्वेदी Sun, 13 Feb 2022 09:10 PM

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हर चुनावी वर्ष में चुनावी-बाबाओं, यानी ज्योतिषियों की बन आती है। भारत एक ऐसा अनूठा देश है, जहां हर दल के अपने ज्योतिषी हैं। कोई आका के गांव का रिश्तेदार है, तो किसी ने पहली बार उसके चुनाव जीतने की भविष्यवाणी की थी। इधर वह संबंधों को कैश करने में लगा है। वोट के पहले हर टिकटार्थी उसके दर्शन कर प्रत्याशी बनने की संभावना तलाशता है। वोट के बाद जीतने की। ज्योतिषी दल के प्रमुख का करीबी है। क्या जाने, समुचित भेंट-गिफ्ट से उससे टिकट की सिफारिश भी कर दे? वाक्पटु होना सफल नेता और कामयाब ज्योतिषी के धंधे की अनिवार्य शर्त है। ज्योतिषी बताता है कि अब तक वह छप्पन टिकटार्थियों का भाग्य बदल चुका है। उसने दल-प्रमुख को आश्वस्त किया कि ये सारे कुंडली के आधार पर जिताऊ प्रत्याशी हैं। 
हर दल के आका के लिए चंदे का फंड निजी संपत्ति से कौन कम है? उसे आशा है, चुनावी निवेश में मुनाफे का सौदा होना ही होना। जीते, तो सत्ता पाकर इन्हीं व्यक्तियों को स्याह-सफेद कर्मों से उसकी जेब भरनी है। पूरी पार्टी को पता है कि वह नैतिकता के मामलों में भले उदार हो, पैसा-कौड़ी के मसले में किसी रियायत का पक्षधर नहीं। समर्थक यह भी जानते हैं कि वसूली के सरकारी साधनों के अलावा, उसे गैर-सरकारी माध्यमों से भी परहेज नहीं है। कौन कहे, कितने दादा-माफिया, उसके एहसानों पर पले ही नहीं, फल-फूल भी रहे? लिहाजा, समर्थक भी उसकी नाराजगी से खौफ खाते हैं। 
सियासत जितनी सिद्धांतहीन होती है, चमचानुमा हस्तियों का महत्व उतना ही बढ़ता है। वर्तमान में, भारत पारिवारिक प्रजातंत्र के दौर से गुजर रहा है। बड़े से बड़ा चुनावी बाबा भी इसके भविष्य के निर्धारण में असमर्थ है। इस समय जनतंत्र के स्थापित नियमों का मूल थाल भारत से नदारद है, सिर्फ उसके प्रदर्शन का ढांचा उपलब्ध है। कौन कहे, यह स्थिति भी बदले। सियासत में जन-कल्याण का उसूल छाए और चमचे फिर चमचे रह जाएं।