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Hindi News ओपिनियन नश्तरदिखाने और निभाने वाली दोस्ती के दांत 

दिखाने और निभाने वाली दोस्ती के दांत 

नाटो की स्थापना जब भी हुई हो, पर इसकी स्थापना की ‘आउटलाइन’ मेरी जवानी के दिनों में ही तैयार होने लगी थी। तब हमारे मुहल्ले के सारे नौजवान बात-बात पर एक-दूसरे के हाथ पकड़कर कसम उठाते थे कि...

दिखाने और निभाने वाली दोस्ती के दांत 
 अशोक गौतम Fri, 04 Mar 2022 09:43 PM

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नाटो की स्थापना जब भी हुई हो, पर इसकी स्थापना की ‘आउटलाइन’ मेरी जवानी के दिनों में ही तैयार होने लगी थी। तब हमारे मुहल्ले के सारे नौजवान बात-बात पर एक-दूसरे के हाथ पकड़कर कसम उठाते थे कि हम अपनी दोस्ती की कसम खाते हैं, हममें से किसी को दूसरे मुहल्ले के किसी गधे ने हाथ भी लगाया, तो हम सब मिलकर उसके हाथ-पांव, दोनों तोड़ देंगे। हममें से किसी की ओर उनका कोई बंदा आंख उठाकर भी देखा, तो उसकी आंखों में लाल मिर्च डाल देंगे। 
उन दिनों मैं अपने को मुहल्ले की ही नहीं, बल्कि कई बार तो पूरे शहर की महाशक्ति समझने लग जाता था। पर एक दिन दोस्ती का सारा घमंड चूर-चूर हो गया। हुआ यूं कि एक दिन बिन बात के दूसरे मुहल्ले के लड़के ने मेरी आती जवानी को ललकार दिया, जबकि मेरी आती हुई जवानी ने उसके मुहल्ले का कुछ भी बुरा नहीं किया था। उसकी बेकार की ललकार सुनकर मैं भी तैश में आ गया। वैसे, मैं गुस्से में इसलिए नहीं आया कि मुझमें उसका विरोध करने का दम-खम था। मेरे पास तो उस वक्त बस अपनी आती हुई जवानी थी, जबकि सामने वाला ऑलरेडी एडवांस लेवल का जवान था। मैं तो गुस्से में इसलिए आया था कि मुझे लगा, मेरे पीछे बीस दोस्त हिमालय की तरह खडे़ हैं। वे मेरी खाल तो क्या, मेरा बाल भी बांका नहीं होने देंगे। 
बस, फिर क्या था! मैंने उसकी ललकार को अपनी दहाड़ से दबाने की कोशिश की, लेकिन सामने वाला सहमने के बजाय और ज्यादा आक्रामक हो गया। दस मिनट, बीस मिनट तक मैं अकेला ही जैसे-तैसे उसका सामना करता रहा और मेेरे दोस्त दूर से हवा में हॉकियां, डंडे लहराते रहे। मैंने जैसे-तैसे हौसले के सहारे उसका मुकाबला किया और अपने का बचा पाया। उसके बाद तो टांगों के नीचे से दोनों कान पकडे़ कि बेटे! वह हर शख्स, जो मुसीबत में काम आने की कसम खाता हो, वक्त पड़ने पर दोस्त नहीं होता।