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2 नवंबर, 2020|1:00|IST

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स्मार्ट सिटी बनने के लक्षण

जब से समाजसेवक ने सूचित किया है कि अब शहर ‘स्मार्ट’ होने जा रहा है, नगरवासी उत्सुक हैं। यह ‘स्मार्ट’ क्या बला है? सरकार के इरादे क्या हैं? क्या भ्रष्टाचार के गड्ढों वाली सड़कों पर ईमानदारी की चमक आएगी? ऐसी कौन-सी जादू की छड़ी अचानक व्यवस्था को मिली है कि वह इंजीनियर-ठेकेदार ही नहीं, पूरे के पूरे विभाग का हृदय-परिवर्तन कर दे? क्या भूखे-अभावग्रस्त को इससे रोटी और बेरोजगार को नौकरी मिलेगी? जितने मुंह, उतनी अपेक्षाएं। एक ज्ञानी का विचार है कि शिक्षा ऑनलाइन हो जाएगी। विद्यार्थी घर बैठे संसार का ज्ञान प्राप्त करेंगे। दूसरे का प्रश्न है कि ‘यह बिना स्मार्ट फोन के कैसे संभव है?’   
‘स्मार्ट सिटी में यह दायित्व सरकार का है कि वह स्मार्ट फोन फ्री में सबको उपलब्ध करवाए, नहीं तो स्मार्ट शहर बनने का लाभ ही क्या है?’ कई मुफ्तखोर इस मत का समर्थन करते हैं। ‘भैया! न उन्होंने पूछा, न हमने बताया। स्मार्ट सिटी का निर्णय तो उन्हीं का है। कुछ प्रभावी प्रलोभन देना अब उनका कर्तव्य है, तभी तो सब प्रेरित होंगे।’ कहीं ऐसा तो नहीं है कि मुफ्त की मानसिकता की जड़ में अभाव का दर्शन है? तभी तो कोई जूते भी फेंके, तो लोगों की प्रार्थना है कि जोड़ी में फेंको। उपयोगी होंगे। क्या यह स्मार्ट सिटी का लक्षण है? यों धार्मिक शहरों के बंदर भी आदमी के उदाहरण से ‘स्मार्ट’ हो चुके हैं। वह प्रसाद ले उड़ने के एक्सपर्ट हैं। कई व्यक्ति सशंकित हैं। कहीं स्मार्ट शहरों में लूटमार की प्रवृत्ति और प्रगति तो नहीं करेगी?
कुछ का विचार है कि यह केवल लचर और भ्रष्ट कानून-व्यवस्था का प्रश्न ही नहीं है। इसमें कहीं न कहीं संस्कार, शिक्षा और समाज की भी भूमिका है। जहां नव-दुर्गा में हम शक्ति की प्रतीक देवियों को पूजते हैं, वहीं रोजमर्रा के जीवन में बेटियों की उपेक्षा के दोषी हैं। शिक्षा की देवी सरस्वती हैं। फिर भी माता-पिता को बेटियों की पेशेवर शिक्षा में विश्वास नहीं है। इस परिपे्रक्ष्य में कहना कठिन है कि स्मार्ट सिटी के नामकरण से हर समाज के हर क्षेत्र में क्रांति मुमकिन है?
 

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  • Web Title:hindustan nashtar column 02 november 2020