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12 अगस्त, 2020|1:13|IST

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अहा निठल्लों की मौजा ही मौजा

निठल्लों के लिए ऐसे मौज भरे दिन शायद ही पहले कभी आए हों। अजगर किसी की चाकरी नहीं करता, पंछी किसी के नौकर नहीं होते। दास मलूका कब का कह गए हैं कि कुछ करने की जरूरत नहीं, सबके दाता राम हैं। दोनों टाइम लंगर खाने का अवसर वर्षों से देते आ रहे हैं। वही दाता राम यहां-वहां लोगों को पका-पकाया भोजन खिला रहे हैं। 
पूरा देश एक महाभोज स्थल बना हुआ है। कई जगह लोग सूखा गेहूं-चावल खा रहे हैं। सरकारी राशन भी तो निपटाना है। आज जो जवान हैं, वर्षों बाद बूढ़े होने पर कहेंगे- अरे, हमारे जमाने में महामारी आई थी कोरोना। पूरा देश जेल बन गया था। पांव में जंजीर बांध दी गई थी। होंठों पर ताले लगा दिए गए थे। हर घर के आगे लक्ष्मण-रेखा खींच दी गई थी। सुंदरियों को भी मास्क पहनने की मजबूरी थी। तब प्रेम निवेदन भी दो गज की दूरी से किया जाता था। छींकने और खांसने से पहले अनुमति लेनी पड़ती थी। पुलिस वालों का मनोबल बहुत ऊंचा था। रिश्वत की रकम में कोई बरकत नहीं रह गई थी। राजनीति तो सीन से बिल्कुल बाहर थी। 
काफी पहले लोग कैरम खेलते थे, फिर कोरोना के डर से कैरम को डंडों के सहारे बिलियर्ड की तरह खेला जाने लगा। प्रेम के क्षेत्र में नैना फाइटिंग पर पाबंदी नहीं थी। फ्लाइंग किस को सैनेटाइज्ड करके फेंका जा सकता था। निकटता कम होते जाने के कारण स्पर्श की अनुभूतियां समाप्त होने लगी थीं। धीरे-धीरे हम सभ्य होते गए। अब सभ्यता के विस्फोट काल में हैं। पहले मां में ममता होती थी। विदा होते समय लड़कियां रोती थीं। बूढ़ों का आदर था। मानव का धर्म मशीन हो जाना नहीं था।
वह लेटे थे। मैंने हाल-चाल पूछ लिया। बोले- साड्डे नाल रहोगे, तो ऐश करोगे। दुनिया के सारे मजे कैश नहीं, अब ऑनलाइन करोगे। आओ हमारे साथ बैठकर उकताओ। खैर अपना-अपना समय है। पंछियों की भाषा पंछी ही समझते हैं। चाहे सब कुछ ठहरा हुआ है, मगर गौरैया आंगन में दिखने लगी हैं। दरअसल वे गौरैया नहीं हैं, जिंदगी हैं। आप देखिए तो सही।

 

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  • Web Title:hindustan nasahtar column 2 may 2020