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अपने बारे में सोचना गलत नहीं, पर ऐसा इस शर्त पर नहीं होना चाहिए कि दूसरों से हमारा कोई मतलब न हो। इसलिए भी सर्वे भवन्तु सुखिन:  यानी सभी के सुख और समृद्धि की कामना करना जड़ों में है। गैब्रिएला कॉलेमन अमेरिकी मानव-विज्ञानी हैं। उन्होंने अमेरिकी व अफ्रीकी समाज पर दिलचस्प अध्ययन किया है। वह कहते हैं कि वह समाज, जहां अपने बारे में ज्यादा सोचा जाता है, भले ही उन्नत हो जाए, लेकिन वहां के लोग सुखी नहीं हो सकते।

वह एक घटना बताते हैं- मैं अफ्रीकी समुदाय के बच्चों के साथ खेल रहा था। मैंने एक पेड़ के नीचे फलों की टोकरी रखी और बच्चों से कहा कि जो सबसे पहले दौड़कर उस टोकरी तक पहुंचेगा, सारे फल उसके हो जाएंगे। सभी बच्चों ने एक-दूसरे का हाथ कसकर थाम लिया और ‘उबंतु’ शब्द का उद्घोष करते हुए दौड़ पड़े और एक साथ टोकरी पर कब्जा जमाया।

मैंने कारण पूछा, तो वे बोले- जब बाकी बच्चे उदास हों, तो एक अकेला फलों की टोकरी पाकर भी खुश कैसे हो सकता है? उबंतु एक शब्द नहीं, बल्कि अफ्रीकी जनजातियों का जीवन दर्शन है। इसका अर्थ है, मैं इसलिए हूं, क्योंकि हम हैं। उबंतु की सोच हमें सामूहिकता की ओर ले जाती है, जो जीवन को उत्सव-सा बना देता है।

डॉक्टर लैरी शेयरविट्ज ने हृदय रोग के कारणों पर शोध में पाया कि जो लोग अपनी बातों में ‘मैं’, ‘मेरा’ जैसे सर्वनाम का ज्यादा प्रयोग करते हैं, वे खुद पर ध्यान देने के बावजूद ज्यादा बीमार पड़ते हैं। इसके उलट ‘हम’ की बात करने वाले खुद पर कम ध्यान देने के बाद भी कम बीमार पड़ते हैं। लैरी और गैब्रिएला, दोनों की बातों का सार यही है कि मैं के आगे उबंतु की सोच रखें।
                                                 

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  • Web Title:Oozing