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संन्यासी और गृहस्थ

बहुत से लोग यह जानना चाहते हैं कि क्या आध्यात्मिक साधना केवल संन्यासी लोगों के लिए है? बिल्कुल नहीं। संन्यासी और गृहस्थ, दोनों आध्यात्मिक साधना कर सकते हैं। इनके बीच के मूलभूत अंतर को समझना होगा...

संन्यासी और गृहस्थ
Monika Minalहिन्दुस्तानWed, 15 May 2024 11:32 PM
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बहुत से लोग यह जानना चाहते हैं कि क्या आध्यात्मिक साधना केवल संन्यासी लोगों के लिए है? बिल्कुल नहीं। संन्यासी और गृहस्थ, दोनों आध्यात्मिक साधना कर सकते हैं। इनके बीच के मूलभूत अंतर को समझना होगा। पारिवारिक व्यक्ति के दो कर्तव्य होते हैं। संन्यासी का एक ही कर्तव्य रहता है। गृहस्थ को परिवार का प्रतिपालन करना होता है और उसका दूसरा कर्तव्य है- अखंड वैश्विक मानव समाज के कल्याण के लिए कुछ करना। ऐसे में, उसे संतुलित रूप से काम करना होगा। यदि कोई व्यक्ति महीने में दस हजार रुपये कमाए और उसमें से आठ हजार दान कर दे, तो उसके परिवार में दुर्व्यवस्था पैदा होगी। घर अभाव में रहेगा और परिजनों में लड़ाई होगी। उसे परिवार की समुचित देखभाल और मानव कल्याण के बीच मात्रात्मक संतुलन बनाना होगा। 
भगवान शिव की एक कथा है। एक दोपहर भोलेनाथ ने देवी पार्वती जी से कहा, ‘देवि, मुझे भोजन तो कराएं।’ पार्वती जी ने कहा, ‘आप घर-गृहस्थी की भी कुछ खबर रखते हैं? केवल एक से दूसरे श्मशान घूमते रहते हैं। आपको तो यह भी पता नहीं होगा कि आज चूल्हा ही नहीं जला। घर में कुछ था ही नहीं, इसलिए रसोई नहीं बनी।’
शिव जी ने पूछा, ‘कुछ दिनों पहले भिक्षा मांगकर जो मैं बहुत सारा चावल-दाल लाया था, वह कहां गया?’ पार्वती जी ने उत्तर दिया, सब समाप्त हो गया है। थोड़ा सा ही था। भंडारगृह में जो थोड़े से चावल थे, उसे गणेश के चूहे ने जलपान कर लिया।’ यह कहानी मानव जीवन की है, लेकिन भक्तों को समझाने के लिए भगवान का मानवीकरण करके लोग कहानियां बना लेते हैं। इससे समझने वाली बात यह है कि घर-संसार चलाने के लिए जरूरी सामान का इंतजाम तो करना ही होगा। छोटे और बडे़ संसार, दोनों के बीच एक संतुलन रखना होगा। यह संतुलन गृहस्थ का कर्तव्य है, संन्यासी का नहीं। संन्यासी के पास जो कुछ भी आएगा, वह सोलह आना संसार को दान कर देगा। यही उसका कर्तव्य है। 
मनुष्य को सभी अवस्थाओं, सभी उम्र में धर्म की साधना करनी चाहिए। सभी लोग अपने-अपने कर्तव्य करते जाएं। यह जो अति साधारण पृथ्वी है; यह जो धूलि की धरणी है, इसी पर स्वर्ग को उतार लाना संभव है। किसी अन्य स्वर्ग की खोज में जाने की जरूरत नहीं पडे़गी। स्वर्ग-नरक जैसी कोई अलग दुनिया नहीं होती। इसी धरती पर स्वर्ग है, यहीं पर नरक है। जब हम कर्तव्य-कर्म को सभी के हित के साथ जोड़ देते हैं, तो उससे मिलने वाला आनंद स्वर्ग का सुख देता है। जहां कोई किसी को प्रताड़ित करता है, वहां नरक जैसा वातावरण बनने लगता है। इसलिए कहा गया है, समान व संतुलित भाव से अपने आध्यात्मिक, मानसिक और सामाजिक कर्तव्य का पालन करते रहो।
श्री श्री आनंदमूर्ति 

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