Mansa vacha Karmana Hindustan Column on 23 march - रोम रोम में राम DA Image

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रोम रोम में राम

राम के चरित्र को आदि कवि वाल्मीकि और तुलसी ने अपनी रामायण कथा में भारतीय संस्कृति के नैतिक संस्कारों से गढ़ा है। कहा जाता है कि वाल्मीकि के राम महामानव, पौरुष और पुरुषार्थ के प्रतीक हैं, वहां राम दृढ़ता और शक्ति के परिचायक हैं, तो तुलसी के राम करुणानिधान हैं। तुलसी ने राम को सरलता, सौजन्य और निश्छल व्यक्तित्व के रूप में प्रस्तुत किया है। उनका संकेत है कि राम का स्वभाव सरल है और छल तो उन्हें छू भी नहीं गया है सरल सुभाउ छुअत छल नाहीं।  राम की निश्छलता उनके चरित्र की पारदर्शिता है। जो बाहर है, वही भीतर भी है।

इसलिए राम को धर्म की मूत्र्ति माना गया- रामो विग्रहवान धर्म:।  यह अनासक्ति ही उनकी विशेषता है। मानस के अयोध्या कांड के श्लोक में तुलसी बताते हैं कि राम को राज्याभिषेक की सूचना से न तो प्रसन्नता हुई, न 14 वर्षों के वनवास से दुख हुआ। राम का यह विशेष गुण है और हमारे देश में गुण को ही पूजा का केंद्र माना गया है। चैत्रमास के शुक्ल पक्ष की नवमी राम का जन्म-दिवस है, जो रामनवमी के रूप में प्रसिद्ध है। तुलसी के राम वैष्णवी करुणा और नम्रता के प्रतीक हैं।

‘आगे सकल शास्त्रों का ज्ञान और पीछे धनुष-वाण’ यही है राम का स्वरूप। राम और कृष्ण हमारी कृषि प्रधान सभ्यता के महान प्रतिनिधि हैं, जो संपूर्ण सृष्टि से अपना संबंध जोड़ लेते हैं। वे उस मनुष्य का प्रतिनिधित्व करते है, जिसकी पूंजी है मनुष्यता और शक्ति है करुणा। इसीलिए रामकथा मनुष्य के ईश्वर बनने की कथा है। कवि सुंदरदास कहते हैं- बैठत रामहि ऊठत रामहि/ बोलत रामहि राम कह्यो है/ देतहु रामहि लेतहु रामहि सुंदर रामहि राम कह्यो है।

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  • Web Title:Mansa vacha Karmana Hindustan Column on 23 march