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भूलों की फेहरिस्त

 

 

आज विज्ञान और गणित के प्रभाव से हम सब समय का महत्व समझने लगे हैं, एक-एक मिनट और सेकंडों का हिसाब रखने लगे हैं। कोशिश की जाती है कि हमारी हर योजना समय पर पूरी हो जाए। आज के औसत आदमी के पास भी रोजाना के कामों की एक लंबी लिस्ट होती है। ऑफिस जाने के पहले हर घर में थोड़ी भागमभाग की स्थिति होती है, लेकिन छुट्टी होते ही घर के सारे काम याद आने लगते हैं। हम जीवन-यापन, घर-गृहस्थी या आर्थिक फायदे के काम जितनी दिलचस्पी से करते हैं, उतनी रुचि अन्य कामों में नहीं ले पाते। कई बार हम अपने गमलों में लगाए फूलों और पौधों की प्यास बुझाना भूल जाते हैं, कहां-कहां गर्द-गुबार रह गया, इस पर ध्यान नहीं दे पाते। खिड़कियों पर झूलते परदे और कमरों में बेतरतीब चीजें जैसे इशारा करती हैं कि हमें भी अपने जरूरी हिसाब-किताब से जोड़ों, सजा-संवारकर रखो।
हम थोड़ा उदार होकर सोचें, तो दुनिया में कुछ भी जड़ नहीं है। हर चीज हमसे बात करना चाहती है, लेकिन हम उनकी भाषा नहीं समझते। ओशो कहते थे कि हम अपने पांव का जूता भी खोलें, तो उसके साथ हमारा व्यवहार अच्छा होना चाहिए। इसका एक अर्थ यह भी है कि हम अपने काम के लोगों के साथ ही संबंध रखते हैं, उनसे ही हम दुआ-सलाम करते हैं। पर अपरिचितों ने हमारा क्या बिगाड़ा है, उनको हमारी प्रेम भरी दृष्टि ही तो चाहिए। हमारी नजरों में अगर प्यार है, तो हमें जड़ पदार्थों का संगीत सुनाई देगा। हमें परिवार, समाज और प्रकृति के सभी उपेक्षित तत्वों की भी फेहरिस्त बनानी होगी और खुद को सुधारने की कोशिश करनी होगी, तभी हमारे जीवन का गणित सार्थक होगा।

 

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  • Web Title:Mansa vacha Karmana Hindustan Column on 14 may