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अपने से बात 

वह कहीं खोए हुए थे। उनके साथी चले आए। हंसते हुए बोले, ‘तुम कैसे अकेले रह लेते हो। मुझसे तो नहीं रहा जाता।’ डॉ रुथ बायर का मानना है, ‘हमें अपने विचारों के साथ अकेले रहने की आदत होनी चाहिए।’ वह मशहूर साइकोलॉजिस्ट हैं। केंटुकी यूनिवर्सिटी में साइकोलॉजी की प्रोफेसर हैं। उनकी चर्चित किताब है, द प्रैक्टिसिंग हैप्पीनेस वर्कबुक: हाउ माइंडफुलनेस कैन फ्री यू फ्रॉम फोर साइकोलॉजिकल ट्रैप्स दैट कीप यू स्टे्रस्ड, ऐन्शस ऐंड डिप्रैस्ड। 
हमें अपने लिए समय नहीं मिलता। समय का रोना रोते रहते हैं। हमें अपने लिए कुछ समय चाहिए। कुछ फुरसत के लम्हे चाहिए। अगर वह मिल भी जाते हैं, तो क्या हम अकेले रहना चाहते हैं? हममें से ज्यादातर अकेले होना नहीं चाहते। अपने विचारों के साथ तो अकेले रहना कतई नहीं चाहते। अपने से बात करना हमें बहुत पसंद नहीं आता। यूं हम अपने से बात करते ही रहते हैं। लेकिन सही मायने में वह अपने से बात नहीं होती। वहां भी हम किसी और से बात कर रहे होते हैं। हम अपने से बात करने में झिझकते हैं। उससे बचते रहते हैं। अपने से बात करने का मतलब है अपने विचारों से उलझना। उन विचारों से टकराना। यह अपने आप में अच्छी-खासी मशक्कत है। अगर हमें अपने विचारों को साफ करना है, तो हमें उनसे उलझना ही होगा। तब जाकर हमारे विचार सुलझ पाएंगे। साफ-सुथरी समझ उसके बिना मुमकिन ही नहीं। हमारे अपने विचार अलग कैसे हो पाएंगे, अगर हम अकेले होकर सोच-विचार नहीं करेंगे। वह अकेलापन एक चुनौती है। लेकिन वह हमें बहुत आगे ले जाता है। इस पर जरूर सोचना चाहिए।

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  • Web Title:Mansa vacha Karmana Hindustan Column on 11 may