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बदलाव की सीमा नहीं 

अभी जो कुछ हुआ, उससे वह हिल से गए थे। और कितना बदलना होगा? यह सवाल उन्हें लगातार परेशान करता रहा। ‘अपने से वादा एक बार की चीज नहीं है। उसी पर हम अड़े नहीं रह सकते।’ यह मानना है डॉ. स्टीवन हेज का। वह मशहूर साइकोलॉजिस्ट हैं। नेवादा यूनिवर्सिटी में साइकोलॉजी के प्रोफेसर हैं। उनकी काफी चर्चित किताब है- गेट आउट ऑफ योर माइंड ऐंड इंटू योर लाइफ। 
बदलाव की कोई सीमा नहीं होती। हम जरूर अपने इर्द-गिर्द कोई सीमा-रेखा खींच लेते हैं। हमें लगता ही नहीं कि बहुत बदलाव कर सकते हैं। इसीलिए जब कोई बड़ा बदलाव सामने आ खड़ा होता है, तो हम परेशान हो जाते हैं। कभी तो ऐसा बदलाव आ जाता है, जिसमें हमारे कुछ करने के लिए होता ही नहीं। जिंदगी में हम अटक जाते हैं। हमें उस अटकाव से बाहर आने के लिए बदलाव की जरूरत महसूस होती है। लेकिन हम उसके लिए मन नहीं बना पाते। कभी लगता है कि बदलाव हमारे बस की बात नहीं। यह तो हमारे आदर्शों और मूल्यों के आड़े आ रहा है। कभी ऐसा हो भी सकता है। लेकिन अक्सर हम किसी बहानेबाजी में उसका इस्तेमाल कर रहे होते हैं। बदलाव किसी हालात से उपजते हैं। हमें उनसे जूझना ही होता है। यह जूझना ही बदलाव को मान लेना है। बदलाव हम चाहते जरूर हैं, लेकिन मजे-मजे में। बहुत कोशिशों वाला बदलाव हमें पसंद नहीं आता। इसीलिए उससे बचते रहते हैं। उलटे तर्क भी गढ़ते रहते हैं। लेकिन जब हम बदलाव को सच मान लेते हैं। उस रास्ते पर चल पड़ते हैं, तो सब कुछ बदल जाता है। तब बदलाव की कोई सीमा नहीं होती।
 

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  • Web Title:Mansa vacha karmana article of hindustan on 9 february