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जीवन को उत्सव बनाना

एक धार्मिक व्यक्ति के पास कोई भी धर्म नहीं होता। एक धार्मिक मनुष्य के पास धार्मिकता के गुण निश्चित रूप से होते हैं, लेकिन वे गुण अव्याख्या हैं। ये उसे चारों ओर से एक काव्यात्मक दीप्ति की भांति घेरे रहते हैं। हां, तुम उसके कार्यों में एक गरिमा देखोगे, तुम उसके जीवन में एक अहोभाव और कृतज्ञता देखोगे, और तुम उसके व्यवहार में एक करुणा देखोगे। लेकिन वह एक हिंदू अथवा मुसलमान अथवा एक ईसाई नहीं होता। ये धार्मिक बनने के बहुत सस्ते और सामान्य तरीके हैं। 
बुनियादी रूप से धर्म एक कला है। कैसे जिया जाए और कैसे मरा जाए, कैसे जीते हुए आनंद मनाया जाए, कैसे आनंद से मृत्यु को गले लगाया जाए, कैसे सौंदर्यमय ढंग से जीवन जिया जाए और कैसे अनुग्रहपूर्ण ढंग की मृत्यु को स्वीकार किया जाए और कैसे अपने पूरे जीवन को, जिसमें मृत्यु भी सम्मिलित है, एक उत्सव बनाया जाए। धर्म का बाइबिल, गीता  और कुरान  से कुछ भी लेना-देना नहीं है। धर्म के पास तो करने को कुछ ऐसी चीज होती है, जो तुम्हारे अस्तित्व में एक रासायनिक रूपांतरण कर देती है। इसलिए जब कभी तुम किसी प्रामाणिक धार्मिक व्यक्ति को पाओगे, तुम उसे हिंदू, मुसलमान, ईसाई या यहूदी जैसा नहीं पाओगे। तुम उसमें प्रामाणिक रूप से कुछ अज्ञात गुणों की सुवास पाओगे, जो उसे परिभाषित करती है। लेकिन यह परिभाषा अहंकार की नहीं होगी, यह परिभाषा तो केवल उसकी जीवन-शैली की होगी। तुम उसमें धार्मिकता के विशिष्ट लक्षण तो पाओगे, लेकिन तुम्हें उनका निरीक्षण करना होगा। उन्हें देखने और समझने की तुम्हारे पास एक विशिष्ट दृष्टि होनी चाहिए।

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  • Web Title:Mansa vacha karmana article of hindustan on 8 february