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संकल्प का दीप 

दिवाली मनाने का उनका अपना ढंग है। उनका मानना है, दिवाली विशुद्ध रूप से प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी का एहसास कराने वाला उत्सव है। इसे उत्सव के रूप में ही मनाना चाहिए। बिजली के झालरों की बजाय शुद्ध देशी घी का दीया जलाने में उन्हें आत्मिक खुशी होती है। यही वजह है, दीपावली के दिन वह लोगों को जागरूक करने के लिए मोहल्ले में एक प्रदर्शनी लगाते हैं और दीपावली के मर्म को समझाते हैं। वह कहते हैं- दीप जला देने भर से समाज और प्रकृति में फैला अंधेरा दूर नहीं हो सकता, इसलिए मन में सद्गुणों का दीया जलाना चाहिए। 

उपनिषद् कहते हैं- तमसो मा ज्योतिर्गमय।  अंधकार से प्रकाश की ओर चलो। रुको नहीं, आगे बढ़ो, लेकिन असतो मा सद्गमय  के रास्ते पर। यह दिवाली का संदेश है। सारी वसुधा पर सत्य का साम्राज्य हो। ऐसा सत्य, जो प्रत्येक प्राणी को अखंड आलोक से भर दे। वैदिक ऋषियों का दर्शन सद्गुणों को सारी वसुधा पर प्रकाशित करने का है। किसी भी मनुष्य के मन के किसी कोने में किसी भी प्रकार का अंधकार न रहने पाए। अपनी आत्मा को प्रकाशित करो-सद्गुणों और मानव मूल्यों से। जब सद्गुणों के दीप जल जाते हैं, तो अवगुणों के दीपों का अस्तित्व स्वयं समाप्त हो जाता है। दीपावली मौलिकता, नूतनता, उत्तमता और उपयोगिता का संदेशवाहक है। जिस तरह से प्रकृति नित नवीन, नित मौलिक, नित उत्तम और नित उपयोगी बनी रहती है, उसी तरह से यदि प्रत्येक व्यक्ति मौलिकता, नवीनता, उत्तमता और उपयोगिता का दीप अपने मन, वाणी और कर्म में प्रज्ज्वलित करता चले, तो मन, वाणी और कर्म में कभी अंधेरा नहीं पसर सकता। जरूरत है संकल्प की।
  

 

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  • Web Title:mansa vacha karmana article of hindustan on 7th november