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समय नहीं है

अमेरिकी अखबार वॉल स्ट्रीट जर्नल  में एक दिलचस्प लेख पढ़ा- जब आप कहते हैं कि मेरे पास समय नहीं है, तो यह एक सफेद झूठ होता है। लेखक का सुझाव है कि बजाय इसके यह कहें कि ‘दिस इज नॉट माई प्रायरिटी’ यह मेरी प्राथमिकता नहीं है। और भी ईमानदारी बरतनी हो तो कहें, मैं इसे करना नहीं चाहता। समय की हुकूमत में हम सब जीते हैं, लेकिन समय को कभी समझते नहीं। 

समय को समझने की कोशिश करते हैं सिर्फ दार्शनिक और ज्ञानी। ग्रीस में झेनो नाम के दार्शनिक हुए, जिन्होंने समय के बारे में गहरे सोचा और लिखा कि हम समय की जो गिनती करते हैं, वह झूठ है। एक क्षण को कैसे नापा जा सकता है? एक मान्यता है बस। उस मान्यता पर पूरा गणित खड़ा है। इसी तर्ज पर ओशो ने समय के तीन हिस्से किए हैं। भौतिक समय, मानसिक समय और वास्तविक समय। भौतिक समय वह, जो कि घड़ी बताती है। वह समय महज व्यावहारिक है, कामकाज के लिए उपयोगी है। उसे बहुत गंभीरता से लेने की आवश्यकता नहीं है। लेकिन आज पूरी दुनिया में इस समय का भयंकर दबाव है लोगों पर। उसी के नीचे एक परत है मानसिक समय की। मनुष्य अधिकतर इसी समय में जीता है। सुख में समय छोटा मालूम होता है, दुख में लंबा मालूम होता है। इंतजार के पल काटे नहीं कटते, मिलन के पल फुर्र से उड़ जाते हैं। लेकिन इस समय को कोई घड़ी दर्ज नहीं कर सकती। और तीसरा है, समयातीत स्थिति। यही वास्तविक समय है। इसमें न भूतकाल है, न वर्तमान, न भविष्य। जब आप ध्यान में गहरे उतरते हैं, तब जानते हैं कि समय है ही नहीं। वह चेतना की मुक्त दशा है।

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  • Web Title:Mansa vacha karmana article of hindustan on 30 july