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छाहौं चाहति छांह

धूप तेज हो गई है। इस बार गर्मी भी कुछ ज्यादा है। बाहर जब ताप बढ़ता है तो सहनशक्ति भी बढ़ जाती है। ग्रीष्म ऋतु के पूरे शबाब पर आते ही प्रकृति निस्तब्ध हो जाती है। सब वृक्षों की छाँव खोजने लगते हैं। मोरारी बापू ने एक प्रवचन में गुजराती कविता का भाव बताया था कि गोकुल-वृन्दावन के वृक्षों से कवि पूछता है- ‘तुमने तो कृष्ण को देखा होगा, तुम्हारी ही डालियों पर वे झूले होंगे? वृक्षों ने कहा- हाँ, पर हम तो जड़ हैं, अगर हमारे पाँव होते तो हम कृष्ण के पीछे-पीछे न चल देते!’

कवि पंत ‘छाया’ शीर्षक कविता में लिखते हैं- ‘कहो कौन हो दमयंती-सी तुम तरु के नीचे सोई/ हाय, तुम्हें भी छोड़ गया क्या अलि, नल-सा निष्ठुर कोई’? निराला कहते हैें- चढ़ रही थी धूप/ दिवा का तमतमाता रूप/ उठी झुलसाती हुई लू/ रूई ज्यों जलती हुई भू/ प्राय: हुई दुपहर/ वह तोड़ती पत्थर। कवि ग्वाल अनोखे अंदाज में गर्मी की प्यास का वर्णन करते हैं- ‘ग्वाल कवि कहैं कोरे कुंभनतें, कूपन तें, लै लै जलधार बार-बार मुख थापिनी/ जब पियौ, तब पियौ, अब पियौ, फेर अब, पीवत हूपीवत बुझै न प्यास पापिनी’। तीखी धूप में हमारी परछाईं भी हमसे अलग चलती है, पर छाया में हम अखंड एकाकार होते हैं। आदमी केवल ग्रीष्म की तप्त बेला में ही छाया नहीं चाहता। इस छाया के अनेक रूप हैं। हमारे सिर पर माँ-बाप और बड़े बुजुर्गाें की छाया होती है, आशीर्वाद भरा हाथ होता है। जब गर्मी की तीव्रता बढ़ती है तो मानो छाँह भी अपने लिए छांह ढ़ूंढ़ने लगती है, इसी तरह हम पर छाया करने वाले बड़े वृद्घ हमसे भी छाया की उम्मीद रखते हैं। यह परस्पर का भाव ही स्नेह को पूर्णता देता है।
    

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  • Web Title:Mansa vacha karmana article of hindustan on 29 may