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मान-अपमान 

वे इस बात से परेशान हैं कि लोग उनको समझने की कोशिश क्यों नहीं करते? जब तक नौकरी की, किसी की हिम्मत नहीं होती थी कि उनके कहे को टाल दे। रिटायरमेंट के बाद अब कोई कद्र नहीं करता। रौब जमाने की आदत के कारण परिवार और मुहल्ले वाले भी उनसे बचकर रहते। कई बार लोगों ने उनसे बीते वक्त की आदतों को छोड़कर नए सिरे से जिंदगी जीने की सलाह भी दी, लेकिन उन्होंने किसी की न मानी। वह कहते,- मैं बहुत बड़ा विचारक हूं। मैं जो सोचता हूं, उसे लोग समझ नहीं पाते। ऐसा मानने वाले कईं लोग हैं जो समाज से सामंजस्य नहीं बिठा पाते। 

स्वयं को सबसे समझदार, विचारवान और इज्जतदार समझना ठीक है कि नहीं, इस पर तमाम मत हो सकते हैं, लेकिन परिवार और समाज से तालमेल बिठाए रखना समझदारी की बात है, इस पर दो मत नहीं हो सकते। हर किसी को समाज में कभी सम्मान मिलता है तो कभी नहीं मिलता। विचारों की उच्चता यही है कि दूसरों के विचारों को भी अहमियत दें। किसी भी व्यक्ति के न तो सभी विचार नि:सार होते हैं और न तो बहुमूल्य ही। सबसे अच्छा विचार और सबसे अच्छा व्यवहार वह होता है जो दूसरों को अहमियत देने की बात करे।

स्वयं को सबसे अधिक समझदार, विचारवान और प्रतिष्ठित समझने का मतलब यह नहीं कि दूसरों के अच्छे विचारों, समझ और प्रतिष्ठता को अहमियत न दें। विचारों में इतनी उदारता, समझ और गुंजाइश तो होनी ही चाहिए कि दूसरे के अच्छे विचारों को सम्मान मिल सके। दूसरों के अच्छे विचारों को आदर देना सम्मान और नफरत करना अपमान। 
  

 

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  • Web Title:mansa vacha karmana article of hindustan on 29 august