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बातें करना

ट्रेन में अक्सर देखा जाता है कि दो अनजान मिलते हैं, अनायास कोई बात छेड़ देते हैं और फिर उनका सफर आसान हो जाता है। लंबी दूरी छोटी हो जाती है। बात करना तो एक बहाना होता है, असल में वे सामने वाले से घुलना-मिलना चाहते हैं। आखिर कोई तो बहाना हो बात करने का। दरअसल, बात करना जरूरी है, घुलना-मिलना और भी। जो बात करने में उस्ताद नहीं होते, वे पीछे रह जाते हैं। जेफ वीस अपनी किताब हाउ टु कूल डाउन अ हीटेड निगोसिएशन  में कहते हैं, नजरें चुराना, दूर कोने में खड़े रहना, बांहें बांधकर रहना, वे चीजें हैं, जो आपकी बड़ी बाधाएं हैं। इनसे बचने में समझदारी है। 
इसका अर्थ यह नहीं कि आप ज्यादा बोलें। संतुलन जरूरी है। जरूरत से पहले व जरूरत से ज्यादा बोलना सामने वाले को आपके प्रति शंकालु बना देता है। बातचीत में सामने वाले को समान रूप से तवज्जो दिया जाना चाहिए। क्रिस्टीन पोराथ, जिन्होंने हाउ टु अवॉयड हार्यंरग टॉक्सिक एम्प्लाई  लिखी है, कहती हैं कि अब तो नियोक्ता नौकरी पर रखने से पहले ऐसे सवाल पूछने लगे हैं, जो चौकीदार, लिफ्टमैन, रिसेप्शनिस्ट आदि से आपके व्यवहार से जुड़ा होता है। वे जानना चाहते हैं कि उन बातों में आप एक्सपर्ट हैं कि नहीं, जिनके बिना भी आपका काम चल सकता है। वे चाहते हैं कि आपमें बातें करने का स्किल हो। बातों की क्या कीमत है, इसे समझने के लिए रूसी साहित्यकार चेखव की कहानी याद आती है। कहानी में एक बूढ़ा तांगेवाला अपनी कहानी सुनाना चाहता है, पर कोई सुनना नहीं चाहता। आखिर वह अपने जवान बेटे की मौत की दुखद कहानी अपने घोड़े से कहता है, तब उसे तसल्ली मिलती है।
 

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  • Web Title:Mansa vacha karmana article of hindustan on 28 june