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8 अप्रैल, 2020|8:33|IST

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फल की प्रतीक्षा

 

 

जब हम जीवन जीने की तैयारी करते हैं, तो हमें बात-बात पर प्रतीक्षा का अभ्यास करना पड़ता है। हम जो भी करते हैं, उसका संबंध उसके परिणाम से होता है। गीता भले उपदेश दे कि कर्म करो और फल की आशा मत रखो, पर ज्ञान-ध्यान की ऐसी बातें सुपाच्य नहीं होतीं। उतावला मन जल्दी से जल्दी अंतिम परिणाम तक पहुंचना चाहता है। वह तो परिणाम जानने के लिए कितने उपाय, कितनी जुगत भिड़ाता है। मनुष्य के जीवन में भीतर और बाहर भले हरदम हलचल होती रहे, पर उसकी शिक्षा का असली केंद्र आस-पास फैली हुई प्रकृति ही है। प्रकृति की चीजों, पशु-पक्षियों से ही उसके ज्ञान के ककहरे का आरंभ होता है। चाहे ‘अ’ से अमरूद हो या ‘आ’ से आम, या ‘क’ से कबूतर या ‘ख’ से खरगोश। ये विराट वन हमें पूर्ण मनुष्य बनाते हैं। ये हमारे परिवार, विचार और दायरे को बड़ा करते हैं। एक वृक्ष को ही देखिए- वह हरे पत्तों और लाल कोंपलों से लहलहाता, धीरे-धीरे फूल और अंत में फल में तब्दील होता है। ये फल उसकी पूर्णता के प्रतीक हैं। परिपक्वता संघर्ष नहीं सिखाती, वह तो रंग-सुगंध और स्वाद से भरी हुई आपके स्वागत के लिए तैयार रहती है।
आचार्य भरत ने अपने नाट्यशास्त्र  में पंचसंधियों में प्राप्ति, प्रत्याशा और फलागम की चर्चा की है। कहानी में नायक-नायिका मिलन फलागम कहलाता है- यही ‘कॉमेडी’ का सिद्धांत है। भारत ने इसी कॉमेडी को महत्व दिया है, जबकि ग्रीक या पाश्चात्य देशों ने ‘ट्रेजेडी’ को। कॉमेडी ने हमें आशावाद का मंत्र दिया है। आज भले हम दुखी हो जाएं, मगर कल या कभी न कभी सुख अवश्य मिलेगा और हमें सुखी होने से कोई रोक नहीं सकता।

 

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  • Web Title:Mansa vacha karmana article of hindustan on 28 january