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कर्म का मर्म

हम जिसे दुनिया कहते हैं, वह कुछ न कुछ होते रहने का नाम है। हमारे अंदर और बाहर, अच्छी या बुरी कोई न कोई घटना घटती रहती है। ओशो इसे ‘बीइंग’ के रूप में स्वीकार करते हैं। शास्त्रों ने भी भवति इति भाव:  के रूप में इसे पुष्ट किया है। कुछ कर्म हमारी क्रिया और इच्छा के परिणाम हैं और कुछ हमारी अनिच्छा के। सिर्फ हमारी मर्जी से दुनिया नहीं चलती। वैशेषिक दर्शन  में कर्म का अर्थ है क्रिया, गति या काम। अन्य दर्शनों में यह एक आध्यात्मिक तत्व है, जो आत्मा का गुण है। कर्म ही मनुष्य के जीवन में संस्कार की रचना करता है। कर्म तीन प्रकार के हैं- प्रारब्ध, संचित और क्रियमाण। प्रारब्ध से हम वर्तमान जीवन का फल भोगते हैं। संचित पहले से ही जमा है, वह प्रायश्चित या ज्ञान से दूर होता है, जबकि क्रियमाण कर्म हमें फल देता है और हमारा भविष्य भी तय करता है। भक्ति में यह कर्म विश्वास है, जो ईश्वर की कृपा से हमें सुख देता है। प्राचीन ब्राह्मण ग्रंथों में इस कर्म को आवागमन और जीवन-मृत्यु के रूप में देखा गया है। भारत में पुनर्जन्म के सिद्धांत द्वारा एक जन्म का कर्म दूसरे जन्म में या तो अच्छा फल देता है या दंड।
मनुष्य आज किसी भी काम को चुनने के लिए स्वतंत्र है। प्राचीन काल में वर्ण-व्यवस्था द्वारा कर्म तय किए गए और आज पुरानी दीवारें ढह गई हैं। आज का मनुष्य स्वतंत्र है कि वह अपने कल्याण के लिए कोई भी काम चुन सकता है। अब भेद-भाव का समय नहीं रहा। आज हमारे कर्म का मर्म होना चाहिए- मनुष्य का कल्याण और व्यर्थ के बंधनों से मुक्ति। जहां कर्मकांड भर नहीं होता, बल्कि वह मनुष्य की पूर्ण स्वतंत्रता की घोषणा भी करता है।
 

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  • Web Title:Mansa vacha karmana article of hindustan on 22 may