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29 मार्च, 2020|5:35|IST

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एक से अनेक

 

 

दुनिया में भला ऐसा कौन है, जो वृद्धि नहीं चाहता। सृष्टि निरंतर विकासशील है। कुछ होना, कुछ बदलना इसका स्वभाव है। सृष्टि की सृजनशीलता से हम भी अछूते नहीं हैं। चाह पूरी हा,े यह कोई नई बात नहीं है। पुराने समय में डच, फ्रांसीसी अंग्रेज भी तो भारत में व्यापारी बनकर आए थे, फिर कल-बल और छल से अंग्रेजों ने भारत पर अधिकार जमा लिया। 
हमारी जो भी क्रिया होती है, उसका फल मात्रा से अधिक मिलता है। धान या गेहूं का एक बीज अनेक में परिणत हो जाता है। इसी प्रकार हमारा एक पुण्य कार्य असीम सुख-शांति दे सकता है और उसी तरह हमारी एक भूल या हमारे एक पाप का परिणाम सदियों तक झेलना होता है। कष्ट की यही दीर्घता नरक है और हमारे पुण्य तथा सद्कर्म की दीर्घता स्वर्ग है। इस सृष्टि की रचना भी एक से बहुत हो जाने की भावना पर आधारित है, जिसे हम एकोऽहं बहुस्याम  के रूप में जानते हैं। आज के उन्नत समाज में भी एक वस्तु के बदले दूसरी वस्तु मुफ्त देकर व्यापारिक लाभ की क्रांति हो रही है। हमें लाभ के ये प्रयोग सिर्फ चीजों तक नहीं रखने हैं। ये संकेत करते हैं कि मनुष्य का असली सुख ‘एकवचन से बहुवचन’ बनने में है। अकेले जीना कोई जीना नहीं होता। दो से ही सृष्टि भी चलती है। 
भारत ने यह भी सिखाया है कि अंत में द्वैत भी मिट जाता है- जीवो ब्रह्मैव नापर:।  आज की भौतिक दुनिया एक के बदले दो का लाभ पाना चाहती है, जो व्यवहार की दृष्टि से लाभदायक तो है, लेकिन हमारा भारतीय चिंतन दो को एक कर देता है, द्वैत को मिटाकर अद्वैत की ओर ले जाता है।
 

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  • Web Title:Mansa vacha karmana article of hindustan on 21 january