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बंद आंखों से देखना

हमारे बाहर दिखाई देने वाली दुनिया जितनी सुंदर है, उतनी ही आकर्षक दुनिया हमारे भीतर भी है। हमें भले ही सौ साल की उम्र मिल जाए, लेकिन हम स्वयं को जान नहीं पाते, अपनी शक्तियों को पहचान नहीं पाते। हम संसार को जानना चाहते हैं, लेकिन स्वयं को परखना नहीं चाहते। हमारी अंतरात्मा का क्षेत्र बहुत विस्तृत है। उसमें पृथ्वी से आकाश तक के सभी तत्व आ जाते हैं। हम जब आनंदित होते हैं, तो प्राय: हमारी पलकें बंद हो जाती हैं। किसी संगीत-सभा में जब कोई गायक सुरीली तान छेड़ता है, तो अनायास हम पलकें बंद कर आनंद के अतल सागर में निमग्न हो जाते हैं। भीतर की यह यात्रा बड़ी मनोरम होती है। हम मन को जो भी आदेश देते हैं, वह उसे पूरा करने के लिए तत्पर हो जाता है। हमारा यह मनोलोक स्वर्ग की तरह सुख देता है, कल्पवृक्ष की तरह हमारी इच्छाएं पूरी करता है। 
 

ओशो ने अनेक बार अपने श्वास के साथ भीतर उतरने का संकेत किया है। जैसे-जैसे हम अपने भीतर प्रवेश करेंगे, हमारा ध्यान पक्का होता जाएगा। नासिका के अग्रभाग पर दृष्टि टिकाने से ध्यान का अभ्यास किया जाता है। दोनों भौहों के आज्ञा चक्र पर ध्यान को केंद्रित किया जाता है। इस ध्यान-योग को ‘दत्तचित्त’ कहा गया है। इस ध्यान में सजगता होती है। हमारी आंखें भले बंद हों, पर हम भीतर से जगे होते हैं। भगवान महावीर ने कहा था- मनुष्यो! निरंतर जाग्रत रहो। धन्य है वह, जो सदा जागता है- जो जग्गति सो समाधन्नो।  मनुष्य के सिर और वृक्ष की जड़ की तरह समस्त धमार्ें का मूल ध्यान होता है। खुली आंखों से हम संसार को देखते हैं और बंद आंखों से उसका अनुभव करते हैं।

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  • Web Title:mansa vacha karmana article of hindustan on 20 November