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मूल स्वभाव

क्रोध और आक्रोश जैसी भावनाएं बढ़ती दिख रही हैं। एक वर्ग है, जो इन्हें बढ़ा-चढ़ाकर दिखाता है और ऐसे में इस सोच को बढ़ावा मिलता है कि ये हमारी मूल भावनाएं हैं। सवाल यह है कि तो फिर हमारा मूल स्वभाव है क्या? दलाई लामा कहते हैं- दया और करुणा है, यह हमें आत्मिक खुशी देती है और इस खुशी के लिए ही हम जन्मे हैं। आगे वह समझाते हैं- हमारे भीतर करुणा पाने और उसे व्यक्त करने की अंतर्जात क्षमता होती है। हम आरंभ से अंत तक के अपने जीवन पर ध्यान दें, तो पाएंगे कि दूसरों से प्राप्त स्नेह से ही जीवन पोषित होता है।
दुुनिया भर में आज फसाद हो रहे हैं। घर-घर झगड़े हैं। व्यक्ति-व्यक्ति में मनमुटाव है, तो इसका मतलब यह नहीं कि हमारा मूल स्वभाव गुस्सैल होना है। यह नहीं कि हमारे अस्तित्व का आधार अपनी स्थिति को मजबूत कर दूसरों की जड़ें कमजोर करना है, ताकि हमारी सत्ता हरदम बरकरार रहे। झगड़ों का मुख्य कारण हमारा स्वभाव नहीं, बल्कि हमारी असंतुलित बुद्धि है। हमारी कल्पनाशील क्षमता का दुरुपयोग है। यह गौर करने वाली बात है कि जब मनुष्य की बुद्धि और उसके अच्छे स्वभाव का मेल होता है, तो सभी कुछ रचनात्मक हो जाता है। 
समाजशास्त्री लिंडा विल्सन कहते हैं- मनुष्य जैविक तौर पर परोपकार के प्रति रुझान रखने वाला प्राणी है, क्योंकि यह जीवित रहने के हमारे मूल सहज बोध का एक अंश है। अपनी बात को आगे समझाते हुए वह कहते हैं कि यही कारण है कि जो आपदा के शिकार लोग होते हैं, उनमें परोपकार की भावना सामान्य से ज्यादा होती है। वे मैं से परे होते हैं और दूसरों के लिए हमेशा अपने भीतर जगह रखते हैं। 
 

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  • Web Title:Mansa vacha karmana article of hindustan on 20 june