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सुबह ऑफिस आने का मन ही नहीं हो रहा था। किसी तरह बस घर से चले आए थे। मन बुझा-बुझा और शरीर थका-थका सा लग रहा था।  
‘हम जब थके-हारे सा महसूस करते हैं, तो अक्सर गलत ढंग से सोच रहे होते हैं।’ यह कहना है डॉ एलिस बॉयस का। वह मशहूर साइकोलॉजिस्ट हैं। ‘मूड्स’ पर खूब काम किया है। उनकी बेहतरीन किताबें हैं- द एन्जाएटी टूलकिट  और द हेल्दी माइंड टूलकिट। 
अक्सर हमारी थकान मन की होती है। और वही हमें परेशान करती है। शरीर भी थकता है, लेकिन वह उतना परेशान नहीं करता। हमारा शरीर थकता है, तो हम क्या करते हैं? हम शरीर को आराम देते हैं। थकान मिट जाती है। ठीक वही हाल हमारे मन का भी होता है। उसे भी हमें आराम देना होता है। हम एक तरह का काम करते-करते ऊब से जाते हैं। और ऊबते ही मन की थकान हावी होने लगती है। 
कभी-कभी अपने मन का काम न कर पाने की वजह से भी थका-थका सा लगता है। कभी अपनी उम्मीदों से बेहतर काम न कर पाने से भी थकान महसूस होती है। काम करते हुए धीरे-धीरे थकान हावी होती रहती है। कभी हमें पता चलता है, कभी नहीं। ये जो धीरे-धीरे थकान होती है, वह हमारी सोच को गलत रास्ते पर मोड़ देती है। कभी हमारी गलत सोच ही उस थकान की वजह बनती है। इसीलिए जब थकान महसूस हो, तो अपनी सोच को जरूर देख लेना चाहिए। हो सकता है कि हमारी थकान की वजह कोई दूसरी हो। लेकिन पहले हमें अपने हिस्से को ठीक कर लेना चाहिए। अपने हिस्से को ठीक करते ही अक्सर थकान गायब हो जाती है।
 

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  • Web Title:Mansa vacha karmana article of hindustan on 20 april