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अंदर की आंधी

गुस्से में थे बॉस। मीटिंग में वह चिल्लाने से लगे थे। ‘कहां खोए हुए हो? मैं कुछ पूछ रहा हूं और तुम...।’
‘अपने अंदर की आंधी को संभालना जरूरी होता है। वह हमें ढहा भी सकती है।’ यह मानना है डॉ. नॉम स्पेंसर का।’ वह मशहूर साइकोलॉजिस्ट हैं। ओहायो की ऑटरबेन यूनिवर्सिटी में साइकोलॉजी के प्रोफेसर हैं। उनका चर्चित उपन्यास है, ‘द गुड साइकोलॉजिस्ट।’ 
हमारी जिंदगी में बहुत कुछ चल रहा होता है। कुछ खट्टा, कुछ मीठा और कुछ कड़ुवा। जब हम गर्दिश में होते हैं, तो जितना बाहर चलता है, उससे कहीं ज्यादा भीतर चलता है। तमाम तरह की भावनाओं की आंधी हमारे भीतर चलने लगती है। लगता है कि कहीं हम उसमें उड़ न जाएं। यह उड़ जाने की बात बेवजह नहीं होती। हम सचमुच उस आंधी में उड़ सकते हैं। कभी यों ही आंधी आती है, तो हम क्या करते हैं? कहीं दुबक जाते हैं। और उसे गुजरने देते हैं। बहुत धूल मिट्टी हो जाती है। लेकिन हम उससे उबरते हैं। धूल-मिट्टी को झाड़ते हैं और आगे बढ़ जाते हैं। इसी तरह अपनी निजी जिंदगी के साथ होता है। हम कहीं परेशान होते हैं। उसका सीधा असर हमारे भीतर होता है। न जाने कितनी तरह की भावनाएं उमड़ने लगती हैं। हमें भरोसा रखना चाहिए कि यह भावनाओं की आंधी भी गुजर जाएगी। वह ज्यादा देर तक नहीं रहेगी। लेकिन सबसे पहले हमें यह देखना है कि आंधी हमें बर्बाद न दे। उसके लिए हमें बहुत सोच-समझ कर काम करना होता है। अगर आंधी ने हमें कहीं चोट पहुंचाई है, तो उसे भी ठीक करना होता है। आंधी के बाद बहुत कुछ नए सिरे से करना होता है। उसके लिए हमें तैयार रहना चाहिए।
 

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  • Web Title:Mansa vacha karmana article of hindustan on 19 may