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स्मृतियों का साथ

अतीत कभी पीछा नहीं छोड़ता। यह ऐसी चीज है भी नहीं, जिससे आप पीछा छुड़ाना चाहें। हमें लगता है कि हम वर्तमान में जी रहे हैं, भविष्य की योजनाएं बना रहे हैं और हमारा भूत महज एक संदर्भ है कि क्या-क्या बीत गया। जबकि ऐसा है नहीं। जो चीजें बीत गईं, वो अनुभव और अनुभव से पैदा हुई सीख के रूप में हमारी चेतना में पैठी रहती हैं। यहां तक कि हमारे न होने पर दूसरों के लिए भी हमारी सीख एक संदर्भ हो जाती है। सरल शब्दों में कहें, तो अतीत में किए गए कर्मों का फल हमारा वर्तमान होता है। यह पूर्वजन्म के कर्मों के फल जैसी बात नहीं, बल्कि घोर वैज्ञानिक कार्य-कारण सिद्धांत वाली बात है। किसी भी कार्य का कारण हमेशा अतीत से जुड़ा होता है। अतीत की स्मृतियां हमेशा ताकतवर होती हैं। बगैर उनके वर्तमान का आधार निर्मित नहीं हो सकता।
महान चित्रकार-लेखक-वैज्ञानिक लियानार्दो द विंसी ने कहा था कि लोग बेवजह समय के तुरंत बीत जाने को लेकर व्याकुल होते हैं, जबकि उनको इस बात का अंदाजा नहीं होता कि समय तो अपनी गति से गुजरता है, पर उसकी एक प्यारी स्मृति, जो प्रकृति ने हमें दी है, वर्तमान में भी उस बीते हुए समय का एहसास बनाए रखती है। जो बीता, जिसमें बदलाव हुआ, वह नया बन जाता है। यह नई चीज पहले से थोड़ी और परिष्कृत व शुद्ध होती है। अज्ञेय इस बात के पैरोकार थे कि स्मृतियों को कभी दफनाया नहीं जाना चाहिए। वह कहते, दफन करने से स्मृतियां मिटती नहीं हैं, कालांतर में वे किस रूप में ज्वालामुखी बनकर फट पड़ेंगी, इसका अनुमान नहीं लगाया जा सकता। वह कहते समाज को सहजता से जीना है, तो स्मृतियों का उसका साहचर्य होना चाहिए।
 

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  • Web Title:Mansa vacha karmana article of hindustan on 19 april