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संदेह अच्छे हैं

 

 

खोजी लोगों की तमाम खासियतों में एक यह भी है कि वे संदेह करने वाले होते हैं। जो मौजूद है, उसके अस्तित्व को लेकर संदेह। उसकी क्रियाशीलता को लेकर संदेह। जो दिख रहा है, उसके दिखने पर संदेह। जो नहीं दिख रहा, उसके न दिखने पर संदेह। जो जैसा है, वैसा ही मान लिया जाए, तो फिर नया नहीं रचा जा सकता। जो नियम मौजूद हैं, उनके प्रति हम रूढ़ हो जाएं और हमें यह लगने लगे कि हमें जो जानना है, वे जान चुके हैं, तो फिर हमारी गतिशीलता पर विराम लग जाता है।
ऑस्ट्रिया के दार्शनिक लुडविग विटगेंस्टाइन जितने बड़े तर्कशास्त्री हैं, उतने ही बड़े गणितज्ञ। उन्होंने मन और भाषा पर भी काम किया है। लुडविग कहते हैं- हम जब मानते हैं कि ऐसा अनिवार्यत: होगा, तो बहुत बड़ी भूल करते हैं। ऐसा कोई साधन नहीं है, जिससे हम कह सकें कि चूंकि ऐसा पहले भी होता रहा है, लिहाजा आगे भी होता रहेगा। आगे उन्होंने कहा कि समूची आधुनिक विश्व-दृष्टि के मूल में यह भ्रम है कि प्रकृति के तथाकथित नियम प्रकृति के स्वरूप की व्याख्या भी करते हैं। वे प्राकृतिक नियमों को उसी तरह सर्वोत्कृष्ट मान लेते हैं, जैसे पुराने समय में लोग ईश्वर व नियति को सर्वोच्च शक्ति मानते थे। हम तब तक सृजन नहीं कर सकते, नई चीजें सामने नहीं ला सकते हैं, जब तक कि पुरानी चीजों को मस्तिष्क से हटा न दें। दार्शनिकों को भाषा में रचनात्मकता सीखने के लिए किसी स्कूल में जाने की जरूरत नहीं, सिर्फ भीतर उतरने और अहंकार को गलाने की जरूरत है। यह अहंकार कुछ और नहीं- मैं जानता हूं, ऐसा ही होगा, क्योंकि यही होता आया है। इन्हें डिलीट कर दें, इन पर संदेह करें, और आगे बढ़ें।
 

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  • Web Title:Mansa vacha karmana article of hindustan on 16 may